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Nightcrawler Review – ‘रात में रेंगने वाला’ साइको मीडियाकर्मी

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Nightcrawler का मतलब होता है “रात में रेंगने वाला” इस फिल्म को देखने से पहले ये सोचा था कि साइकोलॉजिकल क्राइम-थ्रिलर फिल्म है कुछ अलग और असाधारण देखने को मिलेगा लेकिन सब कुछ अलग और असाधारण न होकर बहुत ही रियलिस्टिक था. ये फिल्म एक साथ कई ऐसे काले सच को हमारे सामने बिना किसी जजमेंट के लाती है जिसे आम आदमी तो बिल्कुल समझ ही नहीं पाता और जो समझता है वो ऐसे कर्मों को क्राइम की गिनती में नहीं रखता. एक मीडियाकर्मी अपने अधिकार के नाम पर किसी क्राइम का भागीदार बन सकता है सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षा के लिए? ऐसी बहुत सी घटनाएं होती हैं जिनमें मीडिया एथिक्स ही नहीं बल्कि इंसानियत के एथिक्स का भी दम घोंट दिया जाता है. पर लोकतंत्र है जिसका हम जिस रूप में चाहें इस्तेमाल कर सकते हैं.

Nightcrawler filmania magazine http://www.filmaniaentertainment.com/magazine/

इस फिल्म की कहानी की शुरुआत में मुख्य किरदार ‘लूइस ब्लूम’ (जेक गिलेनहाल) रेलवे प्रॉपर्टी में चोरी कर रहा होता है. एक पुलिसवाला आकर उससे पूछताछ करता है और वो उसे भी लूट लेता है. चोरी का सामान एक दुकान में बेचता है, जहां बेचता है वहीं नौकरी की मांग भी करता है लेकिन वहां का मालिक किसी चोर को नौकरी देने से मना कर देता है. वो वहां से निकल जाता है अपने रेगुलर चोरी-चकारी पर. उसी रात सड़क पर उसे एक एक्सीडेंट हुआ दिखता है. इस घटना को वहां एक स्ट्रिंगर( इंडिपेंडेंट वीडियोग्राफर) शूट कर रहा होता है. वो उसके काम से बहुत प्रभावित होता है और उसके लिए काम करने की बात करता है लेकिन वो भी उसे काम देने से मना कर देता है. ये काम उसके दिमाग में बैठ जाता है. अगले दिन वो एक महंगी साईकल चुराकर बेचता है. उस पैसे से एक कैमरा और पुलिस रेडियो स्कैनर खरीदता है. फिर शुरू होता है उसके स्ट्रिंगर बनने का सफर. वो अपने काम को लेकर इतना डेडिकेटेड होता है कि बिना किसी प्रोफेशनल डिग्री और बेसिक जानकारी के वो इंटरनेट के माध्यम से सब कुछ जल्दी-जल्दी सीखता है. वो रात में रेडियो स्कैनर के माध्यम से हर क्राइम या एक्सीडेंटल स्पॉट पर पहुंच कर उसकी वीडियो फूटेज निकालने लगता है. उन वीडियो फुटेज को वह एक बड़े मीडिया संस्थान में बेच कर पैसे कमाने लगता है. उस संस्थान की क्राइम हेड ‘नीना’ (रेने रूसो) से कई पर्सनल और प्रोफेशनल डीलिंग भी करता है.

शुरुआत में तो लुइस का डेडिकेशन आपको इंस्पायर करेगा लेकिन पुलिस से पहले पहुंचकर एक एक्सीडेंट वाली जगह पर केवल अच्छी फूटेज के लिये जब वह सबूतों से खिलवाड़ करता दिखेगा तब आपको लूइस खामोश क्रूरता दिखाई देने लगेगी. जिसे अपनी सफलता के लिए मौके का इंतज़ार नहीं करना है बल्कि मौका खुद बनाना है. इसी दौरान वो अपनी एक इंडिपेंडेंट वीडियो प्रोडक्शन कंपनी बना लेता है जिसमें वो एक इंटर्न (रिज़ अहमद) हायर करता. उसे पैसे के नाम पर बस ढ़ेला देता है लेकिन अपने साथ उसे भी रात भर घुमाता है. बेरोजगारी का मारा वो लड़का मजबूरन उसके साथ काम करता है. ‘लुइस’ उस लड़के और पुलिस रेडियो स्कैनर की मदद से हर क्राइम पर या तो पहले या वक़्त पर पहुंचने लगता है.

ऐसे ही शहर में एक बड़ा क्राइम होता है जहां घर के तीन लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है. इस दौरान पुलिस से पहले पहुंचकर वो पूरे क्राइम सीन को शूट करता है. इस शूट के दौरान वो इंसानियत और मीडिया के सारे एथिक्स को ताक पर रख देता है. उसके ऊपर महत्वाकांक्षा पूरी तरह से हावी है उसे अपने काम को किसी भी कीमत पर परफेक्ट बनाना है. इस घटना के बाद वो कई ऐसी हरकतें करता है जिससे आप उस किरदार से नफ़रत करने लग जाएंगे. एक सीन और है जिसका जिक्र करना चाहता हूं. वो अपने प्रतिस्पर्धी को हटाने के लिए उसका एक्सीडेंट करा देता है और उसी एक्सीडेंट को खुद शून्य भाव से शूट भी करके उस फूटेज को बेच देता है. ऐसी कई घिनौनी हरकतें आपको ये मुख्य किरदार करता हुआ दिखेगा.

लुइस एक सामान्य मगर खतरनाक सोच वाला साइको है. जो बेहतर वीडियो फूटेज के लिए किसी भी हद तक जानें को तैयार है, इंसान को इंसान नहीं समझता सभी उसके लिए उसके लिये ऑब्जेक्ट मात्र हैं. “जेक गिलेनहाल” ने इस किरदार को इतनी बेहतरीन तरीके निभाया है कि उनकी मासूमियत में छिपे ख़तरनाक मास्टरमाइंड की झलक वक़्त-वक़्त पर मिलती रहती है. ये फिल्म इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक बेरोजगार लेकिन जल्दी सीखने वाले नौजवान को आप खुद के लिए रास्ता बनाते देखेंगे. रास्ता बना कर उसे उसी रास्ते को गंदा करते भी देखेंगे. मीडिया जैसे विषय से जुड़े ऐसे क्राइम पर ये फिल्म प्रकाश डालती है जिसे हम सभी जानते हुए भी इग्नोर करते हैं.

हमारे देश मे टीआरपी का शोर चल रहा है, मीडिया एथिक्स की जोरों पर चर्चा चल रही है, लेकिन ये सिर्फ एक देश की नहीं पूरे विश्व की समस्या है. इस बीच इस फिल्म को देखना बहुत हद तक सच के करीब होने जैसा अहसास देती है. ये मीडिया की काली सच्चाई को एक लड़के की अजीब सी खामोश सनक के साथ दिखाती है. ऐसा नहीं ये पूरी पत्रकारिता जगत को बुरा दिखाती है उसी मीडिया हाउस में किसी फुटेज को दिखाने और न दिखाने पर अलग-अलग राय रखने वाले लोग भी होते हैं लेकिन अंत मे टीआरपी का गंदा खेल सबको मात दे देता है. जिस कारण लुइस अपने क्राइम को और प्रोफेशनल तरीके से करने की खुली छूट मिल जाती है.

साइकोलॉजिकल क्राइम-थ्रिलर पसंद है तो ये फिल्म देख सकते हैं अगर बिल्कुल नये तरीके के कंटेंट का एक्सपीरिएंस लेना है तो इसे जरूर देखिये.

दिव्यमान यती


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