Wed. Oct 5th, 2022

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New Series: बात व्यवस्था की नहीं , सही और गलत की है – निर्मल पाठक की घर वापसी

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 डॉ. एम. के. पाण्डेय
डॉ. एम. के. पाण्डेय

विनय सौरभ की कविता की पंक्तियां हैं –

उस शहर में मत जाओ / जहां तुम्हारा बचपन गुजरा / अब वो वैसा नहीं मिलेगा/ जिस घर में तुम किराएदार थे / वहां कोई और होगा /तुम उजबक की तरह / खपरैल वाले उस घर के दरवाज़े पर खड़े होगे और/ कोई तुम्हें पहचान नहीं पाएगा! / शहर से चुपचाप गुजर जाओ / यही तुम्हारे हक़ में अच्छा होगा / अपने आंसुओं को रोको / कोई पुराना सहपाठी / न कोई पुराना पेड़ मिलेगा “

सैकड़ों वर्षों से पलायन को छाती पर साटे अपने इलाके में वापसी करने वाला शख्स जब तक गाँव में बतौर मेहमान आता है तब तक ठीक है लेकिन गलती से उसने इमोशनल कनेक्ट लेकर घर वापसी करने की कोशिश की तब वही घर और गाँव दुगुनी ताकत से उसको वापस उसके शहर धकेलने में लग जाता है. आज यह समूचे भोजपुरी अंचल की कड़वी सच्चाई है. उसे पलायन का गीत गाना है, शिकायतें करनी है. बस नहीं करना है तो वापसी स्वीकार.

पंचायत 2 का आखिरी एपिसोड मेरे करियर का टर्निंग पॉइंट: फैसल मलिक

बक्सर का एक गाँव है. उस गाँव में एक परिवार है और उस परिवार के बड़े लड़के का बेटा चौबीस बरस बाद वापिस लौटा है. किस्से की बुनियाद यही है और फिर इस वेबसीरीज की तमाम कथा, उपकथा, प्रकरी, पताका इसी के आसपास चक्कर काटती है. पांच एपिसोड में यह कथा ‘निर्मल भैया आ गए’, ‘कल पापा से बात होगी’, ‘छोड़ के गईल आसान होला’, ‘मन की मछरिया’, ‘राम बनने की कोशिश कर रहा हूँ’- में बंटी हुई है.

New Series

  भारतमाता ग्रामवासिनी का भ्रम पाले दर्शकों तक कहीं लौकी, तरबूज,आम, गेहूं, सरसों के लहलहाते खेतों और एक सुंदर सी सदानीरा नदी लिए सुंदर गाँव पर्दे पर आता तो है पर उसकी गुदड़ी के सीवन ज्यों ज्यों उघड़ते हैं सारा आदर्शवाद भरभराकर ढह जाता हैं. निर्मल पाठक की घर वापसी पिता की अस्थियाँ लेकर बरसों बाद गांव लौटे एक लेखक पिता के लेखक बेटे निर्मल (वैभव तत्ववादी) की कहानी है, जहाँ वह आकर उसी सवाल में फंस जाता है, जहाँ से उसके पिता ने उसको लेकर कोफ्त में शहर की ओर पलायन किया था. राहुल पांडेय की लिखी कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है वैसे-वैसे गाँव और परिवार की कुप्रथाओं के अलग-अलग चेहरे सामने आने लगते हैं. नायक का एक छोटा भाई है, जो अपने को बार-बार बड़े भाई का लक्ष्मण कहता है, उसको इस व्यवस्था से कोई दिक्कत नहीं, जिसमें हीरो का दम घुट रहा है. गाँव अपनी बनाई व्यवस्था में घिसट रहा है और चुप है. नायक की छटपटाहट का आलम यह है कि वह पूछता है ‘मैं जानना चाहता हूँ कि ऐसा क्या है जिसे छूने से इंसान को अपना घर छोड़ देना होता है?’- वह इस व्यवस्था को नियति मान बैठे लोगों को कहता है – ‘यह लड़ाई आपलोगों की है मेरी नहीं. मैं तो चार दिन के लिए आया हूँ घूम-फिरकर वापस चला जाऊँगा.’- माँ जिस बेटे से चौबीस बरस बाद मिली है उसकी छटपटाहट में उसको अपने चले गए पति की झलक दिखती है – ‘छोड़ के गईल आसान होला, रुक के बदलल मुश्किल.’- ऐसे अनगिनत संवाद आपके संवेदी तंत्रों को झकझोरने का माद्दा रखते हैं. माँ बनी अलका अमीन अपने अभिनय की समूची गहराई से उपस्थित हैं. भोजपुरी संवादों से गुजरती गेंदा बुआ (गरिमा विक्रांत सिंह) बहुत सहज लगती हैं. सच कहें तो जिस तरह की सटीक भोजपुरी ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ के किरदार बोलते हैं वैसी तो आज की फूहड़ भोजपुरी फिल्मों में भी नहीं दिखती. अधिकतर भोजपुरी फ़िल्मों की भोजपुरी तो दूसरे ग्रह की भोजपुरी होती है. बहरहाल, निर्मल पाठक की कहानी का एक किरदार आपके साथ दूर तक चलेगा – लबलबिया. लबलबिया छोटे भाई के चेलागिरी में साथ रहता है लेकिन घर में चाय दिए जाते वक्त सबको स्टील के कप-ग्लास में चाय दिया जाता है और उसको चीनी मिट्टी के कप में. यह दृश्य नायक को कचोटता है और इसके जवाब के संवाद को जिस तरह से कुमार सौरभ ने जिया है वह कमाल है – ‘ऐसा नहीं है भैया कि हमको फर्क नहीं पड़ता लेकिन बड़का लोग के टोला में जब पहली बार हमको चाय मिला न तो हमको केवल चाय दिखा, चीनी मिट्टी का कप नहीं’.- मंत्री बने विनीत कुमार अभिनय के बरगद हैं. वह जिस तरह से अपने संवादों और देहभाषा के सम्मिश्रण से निर्मल बने वैभव तत्ववादी के किरदार के सामने आते हैं, वह सीरीज में शानदार बन पड़ा है. बदलाव की बात सुन – ‘आप जेएनयू से हैं क्या?’ -कहने का दृश्य सही भी बना है.

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निर्मल पाठक की घर वापसी केवल गाँव की व्यवस्था और चौपाल की राजनीति को ही नहीं देखता बल्कि निर्देशक -लेखक की नजर आंगन में भी गहरे घुसी है. अपनी माँ को रात में बुदबुदाते देखने का दृश्य करुणा पैदा कर देता है. यह एक ऐसा प्रान्त है, जहाँ हर गांव पलायन की पीड़ा और पीछे रह गयी संतोषी जैसी न जाने कितनी माँओं और बहुओं का यथार्थ लिए हुए है. अलका अमीन अपने किरदार के साथ उन सबकी प्रतिनिधि बन सामने आई है. जो परिवार बनाने में खुद को कब बिसार गयी है, कब शेष हो गयी है, पता ही नहीं चलता. निर्मल पाठक की घर वापसी घर की दरारों से भीतर झांकती है. इस मामले में यह पंचायत के आदर्शवादी कथा से कहीं बीस ठहरती है. पंचायत वेबसीरीज निःसंदेह अच्छी सीरीज है पर वह गाँव को अपने पानी टंकी के ऊपर बैठकर दिखाती है जबकि निर्मल पाठक की घर वापसी गाँव के आँगन और चौपाल में लोगों के बीच बैठकर.

निभा (तनिष्क राणा ) जैसी लड़कियाँ भारत के हिंदी पट्टी के आंगन की सच्ची प्रतिनिधि हैं. वह पढ़-लिखकर कलेक्टर बनना चाहती है पर चाची उसके अरमानों पर पानी डालती कहती हैं – ‘हमलोग भी कलेक्टर बनना चाहते थे’. – अपने अरमानों की पोटली लिए निभा जैसी बेटियाँ भाईयों , चाचाओं, पिताओं को अपने से पहले दौड़-दौड़कर पानी पिलाती और रोटी खिलाने में ही बड़ी होकर अपने अरमानों को आँचल में बांध किसी और के घर विदा हो जाती हैं. लेकिन सीरीज का एक बेहद उम्दा संवाद मंत्री की बेटी बनी रीना दुबे (स्तुति त्रिवेदी) के हिस्से आया है. शादी सामने है और वह नायक से कहती है – ‘आप हमारे चक्कर में मत पड़िए . कोई लेना देना नहीं है आपका. जानते क्या हैं आप हमारे बारे में? चार बहन है हमलोग – कोई बेटा नहीं पापा का. कब आती हो, कब जाती हो, कपड़ा तक नहीं पहनते अपनी मर्जी का. हर वक़्त गाँव भर के मर्दों की बड़ी-बड़ी आँखें डराते रहे. अब बहुत हुआ.  आज अगर हम नहीं भागे न,  तो आज शाम तक मेरा ब्याह कराके हमारा मानसिक और शारीरिक बलात्कार करने का लाइसेंस किसी को दे देंगे.”- कहानी के विमर्शात्मक संदर्भों का यह चरम है. ऐसे कई संवाद हैं जो देर तक गूँजते हैं. यह वेबसीरीज अपने संवादों के कारण भी याद किए जाने लायक है. विधायकी का चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटा छोटा ‘लक्ष्मणनुमा’ भाई आतिश का किरदार निभा रहे आकाश मखीजा जमते हैं. उनके किरदार में भाई के प्रति प्यार और फिर बदलाव के लेयर्स को वह सहजता से निभाते हैं. सीरीज के निर्देशक द्वय,  माँ बनी अलका अमीन के लेखक पति की स्मृतियों को खूबसूरती से बरास्ते साहित्य धीरे-धीरे सामने लाते हैं. सीरीज निर्मल वर्मा की परिंदे, एक चिथड़ा सुख, अंतिम अरण्य और मोहन राकेश के आधे-अधूरे से गुजरती है और गहरा अर्थबोध दे जाती है. एक उस कहानी परिंदे की लतिका थी और एक यह निर्मल पाठक की घर वापसी वाली संतोषी है, जो केवल इस वजह से पति के साथ घर छोड़कर नहीं गयी क्योंकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने यह भाव उसमें भरा है कि ‘हम घर के बड़ पतोह हई. हम चल जइती त घर टूट जाइत.’- घर बचाने की एकल जिम्मेदारी वाली व्यवस्था पर धीमे ही सही पर यह सीरीज चोट करती है. यह घर कौन सा घर है, जिसकी भीत की दीवार इतनी कमजोर है कि बाहर से आए एक सदस्य के विचारों से भहराने लगी. नायक को पता लगने लगता है कि ‘पापा घर छोड़कर क्यों चले गए थे’- जबकि अंत तक उनके ‘मन की मछरिया’ कहती रही – ‘ मुझे गाँव की गंगा में ले चलो, उसी में डुबूंगा. मुझे उसी में गंगा में छोड़ आओ.’- और लौटना हुआ भी तो अस्थि कलश में. अस्थि कलश के गिरने का दृश्य निर्देशक और सिनेमेटोग्राफर की उपलब्धि है.

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लेकिन सीरीज के कथाक्रम और इसकी गंभीर व्याख्या पर मत जाइए. इसके सिटकॉम में धनञ्जय पांडेय विधायक जी जमानत जब्त वाले खासे चर्चित हो चुके हैं और गुदगुदाते हैं. उनके किरदार में विस्तार की संभावना है और सम्भव है अगले सीजन में उनका किरदार विस्तार ले. इस सीरीज में चाचा बने पंकज झा अपनी हर उपस्थिति से जता देते हैं कि वह किस स्तर के अभिनेता हैं. आप देखेंगे तब खुद पाएंगे कि उन्होंने किरदार क्या खूब जिया है. वह अपने अभिनय से नायक ही नहीं दर्शकों तक को झकझोर देते हैं.

गाँव की कथा हो और उसके सांगीतिक पक्ष पर बात न हो ऐसा भला कैसे हो सकता है. डॉ. सागर खुद भी भोजपुरी इलाके के हैं और साहित्यिक पीएचडी धारक भी. उनके शब्दों ने गाँव की कथा की नब्ज क्या खूब पकड़ी है – मन की मछरिया, पहेली, आज सपना में, सांवर गोरिया अच्छे गीत हैं और उनका एक पारंपरिक गीत ‘तिलक चढ़ावे के त टुकुर टुकुर ताकsता बिल्कुल कथा के साथ चिपक के चलते हैं. जरा-सा भी इधर उधर नहीं. रोहित शर्मा का सङ्गीत बिना शोर किए, सुकूनदायक और अच्छा है. हालांकि इन तमाम खूबियों के बावजूद निर्देशक-लेखक शुरुआती दृश्यों में बिहार का जैसा चित्रण करते हैं खासकर ट्रेन वाले दृश्य में, वह अजीब है. कभी नब्बे का कोई बरस था, या रहा होगा, पर अब भी उनको कहानी का टेकऑफ वहीं से मिलता है तो अफसोस होता है. फिर एक और बात जो खटकती है वह है इस कहानी का लैंडस्केप. बिहार की यदि कोई फिल्म नीति होती तो बक्सर की यह कथा होशंगाबाद और इटारसी में नर्मदा तट पर न जाती. हालांकि इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता. असल यह है कि सौ सवालों को लेकर भी यह सीरीज बोझिल नहीं है. कई जगह निर्देशन की ढिलाई, कुछ विषयगत, दृश्यगत अतिवाद (मसलन, तिलक में बजता मनवा के सरधा पुराइल हो, घरे आइल बिदेसिया का बजना) और कुछ कलाकारों के हल्के अभिनय को नोटिस भी करें तो यह परेशान नहीं करती. बुनियादी चीज है ईमानदारी, जो ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ की यूएसपी है. इसे देखिए क्योंकि यह दौर अच्छी कथाओं के देखने-कहने का दौर है. अंत में एक बात कि पूरी सीरीज एक गहरे साहित्यिक बोध को लेकर चलती है और निर्मल की वापसी में उसका द्वंद केदारनाथ सिंह की कविता ‘गाँव आने पर’ बार-बार याद दिलाती है – अब आ तो गया हूँ

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पर क्या करूँ मैं /एक बूढ़े पक्षी की तरह लौट-लौटकर/मैं क्यों यहाँ चला आता हूँ बार-बार ?/पृथ्वी पर ऊब/क्या उतनी ही पुरानी है/जितनी दूब ?/यह हवा /मुझे घेरती क्यों है ?/क्यों यहाँ चलते हुए लगता है/अपनी सॉंस  के अंदर के/किसी गहरे भरे मैदान में चल रहा हूँ./कौन हैं ये लोग/जो कि मेरे हैं ?/इनके चेहरों को देखकर/मुझे अपनी घड़ी की सुई/ठीक क्यों करनी पड़ती है बार-बार ?/जो मेरे नहीं है/आख़िर वे भी तो मेरे ही हैं/चाहे जहाँ भी रहते हों/फिर क्यों यह ज़िद/कि यही–यही/सिर्फ यही मेरा घर है ?/अपनी सारी गर्द /और थकान के साथ/अब आ तो गया हूँ/पर यह कैसे साबित हो/कि उनकी आँखों में/मैं कोई तौलिया या सूटकेस नहीं/मैं ही हूँ/क्या करूँ मैं ?/क्या करूँ,क्या करूँ कि लगे/कि मैं इन्हीं में से हूँ/इन्हीं का हूँ/कि यही हैं मेरे लोग/जिनका मैं दम भरता हूँ कविता में/

और यही यही जो मुझे कभी नहीं पढेंगे/छू लूँ किसी को ?/लिपट जाऊँ  किसी से ?/मिलूँ/पर किस तरह मिलूँ/कि बस मैं ही मिलूँ/और दिल्ली न आये बीच में?क्या है कोई उपाय /कि आदमी सही-साबूत निकल जाए गली से /और बिल्ली न आए बीच में?/

–  नायक के अंतस से निकलती आँगन और समाज से गुजरती इस कविता की पीड़ा ही निर्मल पाठक की पीड़ा है, वापसी का सबसे बड़ा सदमा, सबसे सघन पीड़ा. (स्पष्टीकरण : इसे वेब सीरीज की समीक्षा न मानें )

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