Wed. Oct 5th, 2022

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मुहब्बत की आवाज़ केके (KK) का जाना

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KK

 आलेख: डॉ. एम. के. पाण्डेय
आलेख: डॉ. एम. के. पाण्डेय

नाम केके ( KK ), पूरा नाम कृष्ण कुमार कुन्नथ. पर क्या फर्क पड़ता है केके है कि कुन्नाथ. असल चीज तो केके का वो कंठ है, जो ऊँचे पिच पर जाकर भी हमारी जुबां पर शहद सी मिठास ही लाता है और कानों में दूर सांझ की बेला में बजते मंदिर की घंटियों की तरह बजता है. एक लौटती उदास ऋतु में जब दिल भीड़ की तन्हाई में अपने साथ घुल रहा होता था तब भी केके होते थे – मैंने दिल से कहा ढूँढ़ लाना खुशी , नासमझ लाया ग़म तो ये ग़म ही सही, या फिर जब मेहबूब की खूबसूरती के लिए कुछ ना कह सकने की स्थिति हो या फिर शब्द अपने होने के मानी ढूंढे तब केके बगल में आकर हमारे दिल, जुबां और आँखों को अपना सुर दे देते – गुजर ना जाए ख्वाब सा ये सफर – केके मुहब्बत की आवाज़ थे. खासकर मेरे जैसी उस तमाम पीढ़ी के जो 90 से 2000 में हौले सरक रहे थे और स्लैम बुक पुराने पढ़ रहे थे और किसी की कोचिंग, किसी के इंटर कॉलेज वाली का कहीं और जाना नियति और समाज ने तय कर दिया था.

हमारी उम्र के नौजवानों ने दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई, आईआईटी, मेडिकल,इंजीनियरिंग, डीयू,  जेएनयू जैसी जगहें पकड़ ली थी. केके वहाँ भी साथ थे – जब उन तमाम अधूरी दस्तानों का हिय प्रेम की पीर का कवि घनानंद हुआ पड़ा था कि पाऊँ कहाँ हरि हाय तुम्हें – तब केके फिर हमारी प्रेम की पीर के घनानंद हुए – तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही, मुझको सजा दी प्यार की ऐसा क्या गुनाह किया – कैसे कहा जाए कि आम्रपाली, वैशाली, मगध, लिच्छवी एक्सप्रेस जैसी दर्जनों ट्रेनों में अपना गाँव मुहल्ला शहर छोड़ बड़े शहर में  समाने निकले लड़को के वॉकमैन और उसके हैडफ़ोन में केके समाकर तसल्ली दे रहे थे. जिनके पास वह नहीं था उनका दिल केके की आवाज़ से खुद को सांत्वना देता था – सच कह रहा है दीवाना, दिल ना किसी से लगाना, झूठी हैं प्यार की कसमें सारी. फिर इश्क का एक खत लिखना हो तो जेनरेशन्स ने लिखा – तू ही मेरी शब है सुबह है, तू ही दिन है मेरा और शिकायत दर्ज करनी हो तो कहा – सब झूठे झूठे वादे थे उनके, चला आया तू पीछे पीछे जिनके, वो पिया आये ना. – दिल इबादत, तूने मारी इंट्री, खुदा जाने, दस बहाने, आँखों में तेरी अज़ाब सी अदाएं जैसे दर्जनों गीत केके देकर गए हैं.

केके का परिवार केरल त्रिशूर का था लेकिन परवरिश दिल्ली की थी. हालांकि हिंदी सिनेमा में उनको ब्रेक देने का श्रेय विशाल भारद्वाज को जाता है , जिनके लिए उन्होनें ‘माचिस’ में ‘छोड़ आये हम वो गलियाँ गाया’, पर फिल्मों में आने से पहले केके विज्ञापनों के लिए लगभग साढ़े तीन हजार गाने गाए चुके थे. हमारी नब्बे वाली पीढ़ी को याद हो तो वह केके ही थे, जिन्होंने 1999 क्रिकेट विश्व कप में भारतीय क्रिकेट टीम के समर्थन के लिए “जोश ऑफ़ इंडिया” वाला गाना भी गाया था. और इसके तुरंत बाद ही उनका अल्बम ‘पल’ आया था. केके को पल के लिए सर्वश्रेष्ठ सोलो एल्बम का स्टार स्क्रीन अवार्ड भी मिला था.

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केके किशोर कुमार और आरडी बर्मन से बहुत प्रभावित थे. केके ने हिंदी में लगभग 300 से अधिक और अन्य भारतीय भाषाओं तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि में 50 से भी अधिक गाने गाये हैं. केके को छह फ़िल्मफ़ेयर नॉमिनेशन और एक फिल्मफेयर मिला. उनको मिला तमिल में बेस्ट गायक मेल का हब अवार्ड दक्षिण में कन्नड़ का बेस्ट गायकी का फ़िल्मफेयर और एनम-स्वर्णालय सिंगर ऑफ द ईयर मलयालम का अवार्ड उनकी प्रतिभा का सही प्रतिबिम्ब है. केके को अभी और गाना था और गूंजना था पर नियति को कुछ और ही मंजूर था

KK

केके को नब्बे के उतरान का गायक कहें तो अतिशयोक्ति न होगी क्योंकि उनका उभार इसी दौर का है. सोनी म्यूजिक अपनी लॉन्चिंग अल्बम के लिए नए गायक की तलाश में था. ‘पल’ इसी खोज का परिणाम थी. फिर ‘हमसफर’ आयी और कारवां बनता चला गया. पल से शुरू करके उन्होंने अपने गीतों से हमारे लूप में जगह बना ली थी. कल की तारीख बड़ी कातिल रही, जब दीवानों के शहर कोलकाता में एक मखमली आवाज ने चुप्पी साध ली. जीवन के कई उतार चढ़ावों के संगी गायक के कल चले गए. उनकी आवाज़ रह गयी है- सबके पास थाती के रूप में. संगीत का एक सुर केके रातरानी की तरह महकता गाता रहेगा – हम रहे या न रहे कल, कल याद आएंगे ये पल, पल ये हैं प्यार के पल, चल आ मेरे संग चल, चल सोचे क्या, छोटी सी है जिंदगी, कल मिल जाए तो, होगी खुशनसीबी, हम रहे या ना रहे कल, याद आएंगे यह पल.

अलविदा प्यारे केके (23अगस्त, 1970- 31मई 2022)

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