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कमल कपूर (Kamal Kapoor): सिनेमा के विस्मृत चेहरे (8)

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kamal kapoor

 आलेख: डॉ. एम. के. पाण्डेय
आलेख: डॉ. एम. के. पाण्डेय

कमल कपूर (kamal kapoor) एक ऐसे अभिनेता रहे जिनकी अभिनय यात्रा का दायरा पचास सालों तक फैला हुआ है. अधिकतर फिल्मों में इस नीली आंखों वाले अभिनेता ने विलेन का किरदार निभाया पर असल जिंदगी में बेहद सज्जन और मृदुभाषी इंसान थे. पेशावर में 22 फरवरी 1920 को जन्में कमल कपूर की शिक्षा लाहौर में हुई थी. कमल सिनेमा जगत के सबसे पुराने और सम्मानित परिवार कपूर खानदान के रिश्ते में आते थे. पृथ्वीराज कपूर उनकी सगी मौसी के लड़के थे. कमल कपूर के बड़े भाई पुलिस विभाग में बड़े अधिकारी थे. पढ़ाई पूरी करने के बाद कमल कपूर मुम्बई आ गए. यह साल 1944 का दौर था जब पृथ्वीराज कपूर ने उन्हीं दिनों पृथ्वी थिएटर की नींव रखी थी.

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मुम्बई में अपने मौसेरे भाई कमल के पाँव जमाने में पृथ्वीराज कपूर ने बहुत मदद की. पृथ्वीराज खुद थियेटर और सिनेमा जगत की एक सम्मानित और मशहूर शख्सियत थे. पृथ्वीराज कपूर के ही नाटक ‘दीवार’ से उनकी अभिनय यात्रा शुरू हुई. उस समय के इस प्रसिद्ध नाटक में उन्होंने एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई. इस नाटक में ब्रेक मिलने के बाद उनकी सन 1946 में बतौर हीरो एक फ़िल्म आयी – ‘दूर चलें’. इस फ़िल्म में उनकी हीरोइन थी – नसीम बानो. नसीम साठ और सत्तर के दशक की प्रसिद्ध हीरोइन सायरा बानो की माँ थीं. इस फ़िल्म के निर्देशक फणी मजूमदार थे. फ़िल्म तो नहीं चली पर कमल कपूर चल निकले.  इसके बाद उन्होंने बतौर हीरो लगभग इक्कीस फिल्मों में काम किया. इन फिल्मों का हश्र ठीक रहा, अलबत्ता इन फिल्मों में उनकी नायिकाएँ जैसे सुरैया, नसीम बानो, गीता बाली, निगार सुल्ताना, बनमाला, रागिनी अपने समय की आला दर्जे की अभिनेत्रियाँ थीं. उनकी बतौर नायक फिल्मों में डाकबंगला, परदेसी मेहमान, इंसान, जग्गू, हातिमताई, अमीर आदि प्रमुख रहीं. इन सभी फिल्मों का कमल को कोई खास फायदा नहीं हुआ. अलबत्ता सुरैया के साथ जग्गू ने थोड़ी-बहुत चर्चा पाई. शायद नियति कमल से कुछ और चाहती थी और फिर ये तो फ़िल्म इंडस्ट्री है, कहते हैं यहाँ हर फ्राइडे एक किस्मत बन जाती है तो दूसरी बर्बाद हो जाती है.

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कमल भी आये हीरो बनने पर उनकी मशहूरियत बतौर कैरेक्टर आर्टिस्ट और खलनायक ही हुई. लेकिन यह रास्ता भी आसान नहीं था. इन सबके बीच उन्होंने पृथ्वीराज कपूर के बेटे राज कपूर की फ़िल्म ‘आग'(1948) में राज कपूर के पिता की भूमिका निभाई. राज कपूर इस फ़िल्म से बतौर प्रोड्यूसर, निर्देशक और हीरो आ रहे थे. इस फ़िल्म में उनकी भूमिका देख अब उनको अधिकतर कैरेक्टर रोल ऑफर होने लगें. युवा कमल कपूर को यह नहीं जमा और उन्होंने बहैसियत प्रोड्यूसर भी शुरुआत की. कमल कपूर ने 1951 में पार्टनीशिप में आर. एन. जौली के साथ मिलकर अपनी फिल्म कंपनी बनाई और इस प्रोडक्शन बैनर के तले उन्होंने एक फिल्म ‘कश्मीर’ बनाई. यह फ़िल्म भी फ्लॉप हुई और उन्होंने पार्टनरशिप में फ़िल्म बनाने से तौबा कर लिया. इसके बाद खुद को हीरो रख उन्होंने एक और फ़िल्म ‘खैबर’ बनाई. इस फ़िल्म की नायिका निगार सुल्ताना थीं. लेकिन नियति का खेल देखिए यह फ़िल्म भी फ्लॉप हुई और इस बार तो आलम यह हुआ कि उनकी माली हालत ऐसी हुई कि उनको अब तक की अपनी सारी कमाई यहाँ तक कि कार से भी हाथ धो देना पड़ा. यह कमल कपूर के लिए बेहद बुरा दौर रहा. ‘खैबर’ के बाद लगभग दस सालों तक कमल कपूर के लिए बेहद खराब लगभग घर पर बैठने का समय रहा. उधर सन 1945 में ही उन्होंने सुमन देवी से शादी कर ली थी. जिनसे उनके पाँच बच्चे , तीन बेटे और दो बेटियाँ भी थीं. बहरहाल, 1958 में फिल्मकार महेश कौल ने उनको अपनी फिल्म ‘आखिरी दाँव’ में विलेन के रूप में साईन किया. कमल कपूर के पास इस प्रस्ताव को स्वीकारने के सिवा कोई रास्ता नहीं था. इस फ़िल्म में उनके किरदार का नाम प्यारेलाल गुप्ता था. फ़िल्म के हीरो शेखर थे और नायिका थीं – नूतन. हालांकि यह भी अजीब बात है कि उनके किरदार को पसंद किए जाने के बावजूद उनको कोई काम नहीं मिला. कमल कपूर की जिजीविषा सराहनीय रही है. उन्होंने हौसला नहीं खोया.

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टीवी एंकर और वेटरन फिल्म अभिनेत्री तबस्सुम अपने प्रोग्राम में बताती हैं कि कमल कपूर प्रोड्यूसर डायरेक्टर यश जौहर के बेहद शुक्रगुजार थे क्योंकि 1960 के दौर में उन्होंने कमल कपूर की मुलाकात आई. एस. जौहर से करवाई थी. आई. एस. जौहर जैक ऑफ ऑल ट्रेड थे. यानी कॉमेडियन हीरो, निर्माता-निर्देशक सब कुछ. आई.एस. जौहर ने कमल कपूर को 1965 की अपनी फिल्म ‘जौहर महमूद इन गोवा’ में विलेन का काम दिया और आगे भी ‘जौहर महमूद इन हांगकांग’ में उन्होंने कमल कपूर को रोल दिया.  कहना न होगा कि ‘जौहर महमूद इन गोवा’ कमल कपूर के डूबते कैरियर को एक नई उड़ान देने वाली फ़िल्म सिद्ध हुई. कमल कपूर जो कभी कैरेक्टर आर्टिस्ट नहीं बनना चाहते थे, अब उनको इन्हीं किरदारों में पसंद किया जाने लगा.

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1967 में राज कपूर की फ़िल्म ‘दीवाना’ में उन्होंने फिर से राज कपूर के पिता की सफल भूमिका निभाई. इधर जौहर जैसा मित्र था, जिसने लगातार अपनी फिल्मों में कमल को काम दिया था. अब स्थितियॉं बदल रही थी. जल्दी ही कमल हिंदी फिल्म जगत में बतौर कैरेक्टर आर्टिस्ट खासे मशहूर हो गए. उनकी फिल्मी यात्रा लगभग 600 फिल्मों की है जिनमें हिंदी, पंजाबी और गुजराती सिनेमा भी शामिल है. उन्हें अपनी खुद की फिल्मों में अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘डॉन’ में निभाया ‘नारंग’ का  और ‘जब जब फूल खिले’ का किरदार बेहद पसंद था. नारंग का किरदार तो ऐसा चर्चित हुआ कि जो दर्शक उनको नाम से नहीं जानते थे, वह उनको नारंग ही कहकर बुलाते थे. उनकी लंबी फिल्मी यात्रा में तकदीर, राजा और रंक, गोरा और काला, पाकीजा, सीता और गीता, एक मुसाफिर एक हसीना, सच्चा और झूठा, ब्लैकमेल, मर्द, तूफान, चोर मचाए शोर, फाइव राइफल्स, दस्तक, दीवार, खेल खेल में, दो जासूस जैसी फिल्में रही.

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उनके परिवार की बात करें तो कमल कपूर की छोटी बेटी की शादी मशहूर निर्माता रमेश बहल से हुई. रमेश बहल सुपरहिट प्रोड्यूसर थे. उनकी कुछ फिल्मों में जवानी दीवानी, कसमें वादे, बसेरा, द ट्रेन, इंद्रजीत जैसी फिल्में हैं. इसके अतिरिक्त यह भी रोचक तथ्य है कि आज के नामी प्रोड्यूसर गोल्डी बहल कमल कपूर के नाती हैं. गोल्डी बहल ने 90 के दशक की सुप्रसिद्ध हीरोइन सोनाली बेंद्रे से शादी की है.

कमल कपूर के एक भाई रवींद्र कपूर भी थे, जो पंजाबी फिल्मों के हिट एक्टर थे. उन्होंने ‘यादों की बारात’, ‘कयामत से कयामत तक’, ‘जो जीता वही सिकंदर’ जैसी फिल्मों में भी काम किया है. बिल्लौरी आँखों वाले इस खूबसूरत अभिनेता की आखिरी फ़िल्म 1993 में आई ‘ज़ख्मी रूह’ थी. हालांकि वह और काम करना चाहते थे पर जिस्म का साथ न मिला. 2 अगस्त 2010 को मुम्बई में इस बेमिसाल एक्टर का देहांत हो गया. हमारी याददाश्त में कमल कपूर जैसे अपने समय के अनगिनत अभिनेता धूमिल पड़ते जा रहे हैं लेकिन जब-जब पीछे के सिनेमा के पर्दे चमकेंगे, उनमें कमल कपूर जैसे अभिनेताओं की उपस्थिति बार-बार हमें याद दिलाएगी कि हिंदी सिनेमा के बनने में उन सब की बड़ी भूमिका रही है. वह सब रास्ते के वह पत्थर हैं, जिनसे होकर हिंदी सिनेमा यहाँ तक पहुँचा है.

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