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“जो हार मान ले वो हीरो काहे का” : आलोक पांडेय

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  • गौरव

कामयाब होना जितना मुश्किल है उससे कहीं ज्यादा मुश्किल हैं कामयाबी के उन पलों में खुद के पांव जमीन पर टिकाये रखना. और जो कामयाबी में भी खुद को जमीन से जोड़े रख पाते हैं वही लम्बी रेस का घोड़ा साबित होते हैं. कुछ ऐसी ही शख्सियत है बॉलीवुड अभिनेता आलोक पांडेय की. बहुत कम वक़्त में ही फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े निर्देशकों का सानिध्य हासिल होने के बावजूद अपने सफर को मेहनत और समर्पण के साथ सवांरते आलोक आज भी सफलता का श्रेय परिवारवालों और दोस्तों के त्याग को ही देते हैं. भूमिका भले छोटी हो, पर खाते में इंडस्ट्री के दिग्गज निर्देशकों की फिल्में जमा हैं.

फिर बात चाहे अनुराग कश्यप की शार्ट फिल्म दैट डे आफ्टर एवरी डे की हो, नीरज पांडेय की एम एस धौनी की,  राजकुमार हिरानी की पीके की, सूरज बड़जात्या की प्रेम रतन धन पायो की या फिर निखिल आडवाणी और फरहान अख्तर की फिल्म लखनऊ सेंट्रल की हो, हर जगह आलोक की धमक उनके सुनहरे भविष्य का इशारा करती है. अनुराग कश्यप, नीरज पांडेय,  राजकुमार हिरानी, सूरज बड़जात्या, निखिल आडवाणी, रंजीत तिवारी, श्याम बेनेगल, अशोक नंदा,अभिषेक दीक्षित और मुन्ज़िर नक़वी जैसे निर्देशकों के साथ काम करने वाले आलोक की इस साल चार फिल्में आने वाली हैं. राजश्री की हम चार के अलावा वो इस साल अनुपम खेर के साथ वन डे, जॉन अब्राहम के साथ बटला हाउस और पंकज कपूर के साथ सहर में दिखाई देंगे. सिनेमा, टीवी और वेब सीरीज के बढ़ते प्रभाव पर खास बातचीत में आलोक ने बेबाकी से अपनी राय रखी.

सात सालों का लम्बा संघर्ष भी आपको तोड़ नहीं पाया. आखिर वो क्या है जिसने आपके हौसले को अबतक ज़िंदा रखा है?

– मुझपर निर्देशकों का भरोसा. राजकुमार हिरानी और सूरज बड़जात्या जैसा निर्देशक जब पर्सनली आपके काम की तारीफ़ करे तो हौसलों के धरासायी होने का सवाल ही पैदा नहीं होता. सात सालों में भले ही कम फिल्में की हो, पर हर निर्देशक ने मेरे काम को सराहा. कई बार तो बेहतर काम की वजह से ही कई फिल्मों के  किरदार को बाद में डेवलप भी किया गया. ऐसी ही बातें और बेहतर करने और संघर्ष जारी रखने के लिए अंदर से ताकत और हौसला देती हैं. और जो हार मान ले वो हीरो काहे का. (हँसते हुए) वैसे ये मेरी आने वाली शार्ट फिल्म ककक…किरण का डायलॉग भी है.

आजकल के युवा जहां संघर्षों से घबड़ाकर या तो वापसी कर लेते हैं या रास्ता बदल देते हैं, कभी आपका मन नहीं हुआ टेलीविज़न की ओर रुख करने का ?

– मानता हूं कि टीवी में काफी पैसा है, शोहरत भी है. पर फिल्म इंस्टिट्यूट में पढ़ाई के दौरान ही ठान लिया था कि फिल्मों के अलावा कुछ नहीं करूँगा. ये अलग बात है कि शुरुआत ही डीडी के सीरियल से हुई. पर इसे भी मैं पॉजिटिव ही लेता हूँ की दूरदर्शन की सीरियल करने वाले अधिकतर कलाकार आगे चलकर फिल्मों का बड़ा नाम बने हैं(हँसते हुए). हाँ आजकल वेब सीरीज का प्रभाव भी फिल्मों के लेबल का हो गया है, जहाँ सिनेमा का हर बड़ा स्टार काम कर रहा है. तो वेब सीरीज में मौका लगा तो जरूर काम करना चाहूंगा.

इस साल आपकी चार फिल्में आने वाली हैं. कामयाबी का रास्ता खुलता नज़र आ रहा है क्या?

– मेरा मानना है कामयाब होना या न होना हमारे हाथ नहीं है. हमारे हाथ जो है वो बस इतना कि मेहनत किये जाओ, और वो मैं पूरी ईमानदारी से कर रहा हूँ. बाकी सब दर्शकों के हाथ है. जहाँ तक इस साल आने वाली फिल्मों कि बात है तो इस साल मेरी चार फिल्में हैं. राजश्री की हम चार आ चुकी है. अनुपम खेर सर के साथ वन डे आने वाली है. उसके बाद निखिल आडवाणी की जॉन अब्राहम के साथ बटला हाउस और पंकज कपूर सर के साथ सहर आएगी. इन सब से काफी उमीदें हैं. इसके अलावा गौरव, जो कि मेरे अच्छे दोस्त हैं, उनके साथ एक शार्ट फिल्म ककक…किरण की है, जिसमें मेरे कई सारे शेड्स हैं. यह फिल्म पहले ही देश-विदेश के फेस्टिवल्स में सराही जा चुकी है. जल्द ही इसकी रिलीज के साथ इसके अगले पार्ट की भी शूटिंग शुरू होगी. 

थोड़ा पीछे चलते हैं, यूपी के छोटे से शहर शाहजहांपुर के छोटे से गांव के लड़के की आँखों में अभिनेता बनने का सपना कब और कैसे तैर गया?

– (हंसते हुए), ठीक-ठीक तो कह नहीं सकता, पर ये ख्वाब शायद होश सँभालने के पहले जन्म ले चूका था. मां बताती है कि छुटपन से ही मुझे आईने से प्यार था. घंटो आईने के सामने बैठ तरह-तरह की वेशभूषायें बनाना और नक़ल करना मेरी आदत थी. फिर स्कूल के हर फंक्शन्स में भाग लेने लगा. दर्शकों की तालियां मेरे अंदर रोमांच भर देती थी. कॉलेज के दिनों में दोस्तों के साथ थियेटर का जो चस्का लगा, उसने आख़िरकार मुझे सिनेमा की दहलीज़ तक पहुंचा दिया.

शाहजहांपुर से शुरू हुआ सफर एनएसडी में मिली असफलता के बावजूद मुंबई पहुँचने तक नहीं थमा. इस सफर के पीछे की मुख्य ताकत क्या रही?

अपनी ताकत की बात करूँ तो मेरी फैमिली मेरी सबसे बड़ी सपोर्ट सिस्टम है. बचपन से आज तक मेरी हर कोशिशों में घरवालों का पूरा सहयोग रहा. एनएसडी की असफलता के बावजूद थिएटर जारी रख पाना, गाँव से कोलकाता अभिनय प्रशिक्षण के लिए जा पाना, और फिर मुंबई जैसे शहर में भविष्य की तलाश के लिए आना, ये उनके बगैर संभव ही नहीं था. कॉलेज और थिएटर के दोस्तों की भूमिका से भी इनकार नहीं कर सकता.

इस सफर को थोड़ा विस्तार से बताएं?

कॉलेज की पढ़ाई के दौरान कुछ दोस्त बने जो थिएटर से जुड़े थे. उनके साथ पहली बार जब एक प्ले देखने का मौका लगा वही से मेरी दुनिया बदल गयी. पहला प्ले देखकर ही लगा यही तो है जो मैं करना चाहता हूं. फिर मैंने भी शाहजहांपुर में एक थिएटर ग्रुप ज्वाइन कर लिया. पर महीना पूरा होते होते गाँव शहर का चक्कर लगाना मुश्किल लगने लगा.  शहर में किराये का घर भी लिया, पर जल्द ही सब छोड़कर वापस गाँव चला गया. पर होनी को कुछ और ही मंजूर था. दो ही महीने बाद अखबार के जरिये पता लगा की जिस थिएटर ग्रुप में मैं काम करता था वो कहीं बाहर  शो करने गया है और उसमें मेरे दो दोस्त भी हैं. मुझे लगा अगर मैंने ग्रुप छोड़ा  नहीं होता तो आज मेरा भी अख़बार में नाम होता. अंदर के कीड़े ने उबाल मारा और मैं एक बार फिर जा पहुंचा उसी संस्कृति ग्रुप के पास. एक साल तक आलोक सक्सेना जी से अभिनय की एबीसीडी सीखी. आगे चलकर एनएसडी में प्रारंभिक सिलेक्शन के बावजूद आखिरी चरण में चुनाव नहीं हो सका.  तब बीएनए लखनऊ में एडमिशन ले लिया. दो साल की पढ़ाई के दौरान कई प्लेज किये. फिर वहां से 45 दिनों के फिल्म अप्रेसिएशन कोर्स के लिए कोलकाता सत्यजीत रे फिल्म इंस्टिट्यूट जाने का मौका मिला. कुछ दिनों बाद छह महीने का एक और कोर्स किया और दिसंबर 2012 में फाइनली मुंबई आ गया.

मुंबई पहुँचने और काम मिलने के बीच का वक़्त कैसा रहा?

देखिये, मेरी जर्नी बाकियों की तरह ज्यादा मुश्किल भरी नहीं रही. इस मामले में मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूँ. थिएटर के दोस्त पहले से मुंबई में थे, उन्होंने ही पनाह दी. फिर कुछ महीनों में सीआईडी सीरियल में छोटा सा काम मिला जो दिख भी नहीं पाया. पर जल्द ही मुझे रवि खेमू जी की सीरियल में अच्छी भूमिका मिली जो वो दूरदर्शन के लिए बना रहे थे. चूँकि खेमू सर मुझे लखनऊ के दिनों से ही जानते थे तो भरोसा कर उन्होंने ये किरदार मुझे सौंपा. इसी दौरान अनुराग कश्यप की शार्ट फिल्म भी मिल गयी थी, जिसमे मैंने राधिका आप्टे के साथ काम किया.

सीरियल से बड़े परदे तक का सफर कैसे तय हुआ?

खेमू सर की सीरियल के बाद लगभग एक साल का गैप रहा. काम की तलाश जारी रही. इस बीच राजश्री प्रोडक्शन में प्रेम रतन धन पायो के लिए अप्लाई किया, और संयोग ऐसा बना की वहां मेरा सिलेक्शन हो गया. सूरज बड़जात्या जी ने खुद मेरे ऑडिशन की तारीफ़ की. इस फिल्म के दौरान कास्टिंग डायरेक्टर विक्की सिदाना जी के संपर्क में आया, जिनकी वजह से आगे चलकर मुझे धोनी और लखनऊ सेंट्रल जैसी फिल्मों में काम मिला.

धौनी से मिली सफलता ने लाइफ में क्या कुछ बदलाव लाया?

बदलाव तो बस इतना है कि लोग जानने लगे हैं. गाँव में लोग चर्चाएं करने लगे हैं, जाने पर मिलने आ जाते हैं. मेरे काम को नोटिस किया जाने लगा है. पर इस फिल्म के बाद सबसे बड़ा बदलाव मेरे अंदर आया. नीरज पांडेय जी के साथ काम करने के अनुभव और उनके भरोसे ने अंदर और जिम्मेदारियों का एहसास भर दिया है. अभी राजश्री की ही एक और फिल्म हम चार कर रहा हूं, जहाँ पिछले अनुभव काफी काम आ रहे हैं.

छोटे किरदारों के बावजूद आप लोगों के जेहन में याद रह जाते हैं. किरदार की तलाश के लिए क्या प्रोसेस अपनाते हैं ?

– सबसे पहले तो किरदार के परिवेश, लुक्स और थॉट प्रोसेस को समझने का प्रयास करता हूँ. डायरेक्टर्स के इनपुट पर भी काम करता हूँ. और इसके अलावे जिस बात का सबसे ज्यादा ख्याल रखता हूँ वो है कैमरे के सामने जितना हो सके नेचुरल बने रहने का प्रयास. क्यूंकि किरदार की डिमांड से ज्यादा एफर्ट अभिनय को बनावटी बना देता है.

किस तरह का किरदार आपके अंदर के अभिनेता को संतुष्ट करता है ?

– देखिये, अभिनेता अगर संतुष्ट हो गया फिर उसके अभिनय का द एंड हो जाता है. रही बात पसंदगी की, तो मेरे सारे किरदार मेरे दिल के करीब हैं, पर शार्ट फिल्म ककक…किरण का मेरा किरदार मुझे ही नहीं आप सब को भी खासा पसंद आएगा. साइको थ्रिलर वाली इस फिल्म में मेरे किरदार पर काफी मेहनत की गयी है. उम्मीद है जल्द ही ये आप सबके सामने होगी.

प्रोफेशनल लाइफ से थोड़ा पर्सनल लाइफ की और रुख करते हैं, कुछ फैमिली बैकग्राउंड की बात बताईये?

जैसा पहले भी बता चूका हूं मेरी फैमिली ही मेरी पिलर है. माँ-पिताजी के अलावे घर के चार भाईयों में मैं सबसे छोटा हूं. घर से बाहर निकलने से लेकर आज तक उन लोगों ने मेरा ख्याल रखा है. अब तो मेरी पत्नी के रूप में मुझे एक और सपोर्ट मिल गया है. खुशकिस्मत हूँ की आज के वक़्त में भी एक बड़ी जॉइंट फैमिली का हिस्सा हूँ.

थिएटर से फिल्मों का रुख करने की चाहत रखने वालों के लिए क्या कहेंगे?

बस इतना कि मुंबई आओ, पर आने से पहले थिएटर में खुद को इतना मांज लो कि आगे जाकर हताश ना होना पड़े. भीड़ में जगह बनाने और टिके रहने के लिए  खुद पर मेहनत और समर्पण बहुत जरूरी है.

फिल्मोग्राफी

धोनी, प्रेम रतन धन पायो, सनम तेरी कसम, पीके, लखनऊ सेंट्रल, हम चार, वन डे, बटला हाउस, आने वाली फिल्में- हुड़दंग, सहर, एक्सेल एंटरटेनमेंट और फ्राइडे फिल्म वर्क्स की वेब सीरीज के अलावा कई फिल्मों में लीड रोल के लिए बातचीत

शार्ट फिल्म

दैट डे आफ्टर एव्री डे, लड्डू, ककक…किरण

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