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सिनेमा के जरिये एनकाउंटर केस के पन्ने खंगालता बाटला हाउस

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दिव्यमान यती

कलाकार- जॉन अब्राहम, मृणाल ठाकुर, मनीष चौधरी, रविकिशन, आलोक पाण्डेय, राजेश शर्मा .
लेखक- रितेश शाह
निर्देशक- निखिल आडवाणी
13 सितंबर 2008 को दिल्ली में पांच सीरियल ब्लास्ट हुए थे. जिसके एक हफ्ते बाद 19 सितंबर 2008 की सुबह बाटला हाउस के एल-18 में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा एक एनकाउंटर हुआ. इस एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिद्दीन के 2 संदिग्ध आतंकवादी मारे गए. इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के एक पुलिस ऑफिसर भी शहीद हो गए थे. इस घटना के बाद देश के कुछ मानवाधिकार संगठन और मीडिया का एक तबका इसे फर्जी एनकाउंटर मानने लगा. इसी घटना के बाद की दिल्ली पुलिस के संघर्ष की पूरी कहानी बयां करती है बाटला हाउस.
फिल्म की कहानी दिल्ली पुलिस के डीसीपी संजय कुमार (जॉन अब्राहम) जो उस एनकाउंटर वाली स्पेशल सेल के हेड थे उन्हीं के इर्दगिर्द घूमती है. घटना के बाद उन्हें और पूरी दिल्ली पुलिस को कटघरे में खड़ा कर दिया गया था. संजय कुमार सरकार के दबाव के बावजूद इंडियन मुजाहिद्दीन के फरार आतंकी को ढूंढने में लगे रहते हैं. इस बीच वो मानसिक रोग से भी जूझते नजर आते हैं. बहुत से लोगों को खासकर युवा पीढ़ी को इस एनकाउंटर तथा उसके बाद उपजे विवाद के बारे में अधिक जानकारी नहीं होगी लेकिन ये भारत की सबसे कंट्रोवर्सिअल एनकाउंटर में से एक रही. क्या ये एनकाउंटर सच में फर्ज़ी था या दिल्ली पुलिस सही थी? इन सवालों का जवाब कैसे ये फिल्म देती है ये आपको फिल्म देखने के बाद ही पता चल सकेगा.
दिल्ली पुलिस के डीसीपी संजय कुमार के किरदार के साथ जॉन अब्राहम ने पूरा न्याय किया है. वो अक्सर माचोमैन या एक्शन हीरो वाले किरदारों में देखे जाते हैं, लेकिन इस बार वो एक अलग ही अंदाज में नजर आये हैं. उन्होंने अपने अभिनय को एक नया आयाम दिया है. इस किरदार को देखते हुए उनके मद्रास कैफे वाले किरदार की याद आती है, ये याद उनके दमदार अभिनय की कारण ही आती है. वो इस बार अपने एक्शन से ज्यादा इमोशनल और फ्रस्ट्रेशन वाले शेड्स से प्रभावित करते हैं. जॉन अब्राहम के सीनियर ऑफिसर के रोल में मनीष चौधरी ने अच्छा काम किया है. वहीं जॉन की पत्नीे का किरदार निभा रही मृणाल ठाकुर थोड़ी डरी-सहमी नजर आईं हैं और वो उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाती. शहीद हुए ऑफिसर केके की किरदार में रवि किशन ने कम वक़्त में अपनी पूरी प्रतिभा दिखाई है. एक और किरदार जो सबका ध्यान खींचता है वो है तुफैल. आलोक पाण्डेय द्वारा निभाया गया ये किरदार जब जॉन अब्राहम के सामने आता है तब उस छोटे से सीन में जॉन को बराबर की टक्कर देता है.
फिल्म के लेखक रितेश शाह ने एक कसी हुई स्क्रिप्ट लिखी है. निर्देशक निखिल आडवाणी जो एक लंबे गैप के बाद निर्देशन करते दिखे हैं, वो कई वर्षों से इस फिल्म पर काम कर रहे थे. उनकी मेहनत इस फिल्म के निर्देशन में दिखती है. इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी काफी उम्दा है. फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक भी कमाल का है वो आपको हर सीन के साथ बांधे रखता है और आपके सस्पेंस को बनाये रखता है. फिल्म में तीन गाने हैं दो गाने फिल्म के साथ चलते हैं लेकिन एक आइटम नंबर साक़ी-साक़ी फिल्म में बेवजह और जबरदस्ती का लगता है.
फिल्म शुरू में डिस्क्लेमर देती है ये डॉक्यूमेंट्री नहीं है, ये दिल्ली पुलिस से प्रेरित है. ये कई जगह दोनों पक्षों के दलीलों को दिखाती है जो शायद दर्शकों को ज्यादा बुद्धि का प्रयोग करने पर मजबूर कर सकती है. इस फिल्म में नेताओं के बयानों का रियल विज़ुअल भी इस्तेमाल किया गया है. यह फिल्म साहसिक तरीके से अपनी बात स्पष्टता से रखती है. जॉन का एक डॉयलॉग कि हम माइनॉरिटी के खिलाफ नहीं बल्कि देश की सुरक्षा के लिए अपना काम कर रहे हैं. ये डॉयलॉग फिल्म के सार को भी दर्शाती है कि ये फिल्म बाटला हाउस एनकाउंटर के सभी पहलुओं को दिखाना चाहती है.
फिल्म इसलिए भी देखी जानी चाहिए क्योंकि ये जनता के लिए मर-मिटने वाले पुलिस महकमे के सामाजिक संघर्ष की कहानी बताती है, जब उन्हें जल्लाद और खूनी जैसे शब्दों से पुकारा जा रहा था. जॉन अब्राहम की बेहतरीन एक्टिंग भी आपके लिए एक ट्रीट जैसी होगी. अगर आप सिर्फ बेसिर पैर की मारधाड़ देखने वाले और ज्यादा बुद्धि का प्रयोग ना करने वाले दर्शक हैं तो ये फिल्म आपकी सांसे फुला सकती है.


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