Sun. Jul 25th, 2021

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वहाँ से ज़िंदगी शुरू होती है – Once again

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-मुन्ना पांडेय

इससे पहले कि कंवल सेठी की फ़िल्म “वन्स अगेन” के बारे में कुछ कहा जाए, फ़िल्म की नायिका शेफाली शाह के लिए, उनके किरदार के लिए वर्षों पहले केदार शर्मा का लिखा ‘जिंदगी’ फ़िल्म का एक गीत “मैं क्या जानूँ क्या जादू है/इन दो मतवाले नैनों में जादू है”- बरबस ध्यान आ जाता है. इस फ़िल्म की लीड कास्टिंग शेफाली शाह और नीरज काबी किस्से में इस कदर समाए हैं कि यह निर्णय करना मुश्किल है कौन अपने किरदार में अधिक ईमानदार है. दोनों एक-दूसरे के पचास-पचास प्रतिशत की हिस्सेदारी वाले सहयोगी बनते हैं न कम न अधिक. यह दोनों एक्टर्स के अभिनय कौशल का उरूज है. तारा (शेफाली शाह) सिंगल माँ हैं और अमर कुमार (नीरज काबी) भी सिंगल पिता. नायिका के हिस्से दो संताने एक युवा लड़का (प्रियांशु), जिसकी जल्दी शादी होने वाली है और एक युवा बेटी (बिदिता बाग) है तो नायक के हिस्से के युवा पेंटर बेटी (रसिका दुग्गल). उम्र के उतरते वर्षो में सुपरस्टार कुमार साहब और रेस्तरां की मालकिन तारा शेट्टी अपने जीवन के एकाकीपन और एक साथी के स्नेहिल साहचर्य के अव्यक्त हिस्से की पूर्ति में धीरे धीरे पास आते हैं. एक फोन डायल होने से शुरू हुआ यह किस्सा फ़िल्म के शुरू होने की जमीन तैयार करता है और हम अपने समय की एक खूबसूरत कथा के टेकऑफ होने को देखते कब उसके सहचर बन जाते हैं पता नहीं चलता. टिफिन लेने-देने और टेलीफोनिक बातचीत का क्रम एकबारगी यह भ्रम जरूर पैदा करता है कि कहीं हम एक और लंचबॉक्स तो नहीं देखने जा रहे पर भ्रम आखिर भ्रम ही होता है. एक को छुटपन में समुंदर से डर लगता है तो दूसरे को पहाड़ों की ऊँचाई से, पर दोनों का एक और डर है जब नायक कहता है – हमें अब मिलना चाहिए और नायिका यह कहकर फ़ोन रख देती है – मैं सिर्फ खाना ही अच्छा बनाती हूँ. फ़िल्म में शहर के कंक्रीट वालीं ऊंचाइयों के मध्य यह प्रेम आकार ले रहा है. दोनों के अपने हिस्से की सामाजिक जिम्मेदारियां हैं. नायिका अपने पति के जल्दी गुजर जाने के बाद अब बेटे की शादी की तैयारियों में है तो पिता अपनी बेटी के लिए उस स्पेस की खरीद कर रहा है जहाँ उसकी बेटी अपना एक्जीबिशन लगा सके. पर नायक पिता के मन में यह क्षोभ भी है कि जो बचपन वह देना चाहता था नहीं दे पाया. तारा भी अपने अकेलेपन के लिए बेटे से कहती है – पापा होते तो इतनी अकेली नहीं होती न देव! दो साल के थे तुम. फ़िल्म एक खास उम्र के दो व्यक्तियों की उनके अपने भीतर उतरने की जद्दोजहद और उसके अन्तर्विरोधों में बाहर के शोर और अंदर की खामोशी से लड़ता है पर कहीं भी गैर जरूरी दृश्यों और बेवजह के संवादों का रूखापन नहीं है. कंवल सेठी ने बेहद महिनी से इसको रचा है. अगर यह कहा जाए कि संवाद इस फ़िल्म की रीढ़ हैं तो फिल्मांकन उसका उत्स तो अतिश्योक्ति न होगी.
बेटियाँ अपने माता-पिता को समझ लेती हैं और उनके साथ खड़ी होती है. बिदिता बाग अपनी माँ से कहती है – ”यू आर फेमस नाउ. सिर्फ दोनों की वजह से नहीं गयी! जिंदगी ऐसे नहीं कटती.” यह संवाद तब है जब तमाम रिश्तेदारियाँ, मसाला खबरें तारा और अमर कुमार के बारे में बोल और लिख रहे हैं.
इस फ़िल्म को शेफाली शाह के लिए देखा जाना चाहिए. तारा शेट्टी के किरदार को जब अमर कुमार अपने दोस्तों से मिलाते कहता है – मीट तारा शेट्टी! खाना बनाती हैं मेरे लिए. उस अकेले दृश्य में बिना अतिरिक्त प्रयास के शेफाली की आँखेँ हमें याद रह जाती हैं. इस अभिनेत्री ने सत्या में अपने को साबित किया था, यहाँ वह अपने सम्पूर्णता में हैं. मैं भावातिरेक का खतरा उठाते हुए कहूँ तो वह स्तनिस्लाविस्की स्कूल की मेथड एक्टिंग के तमाम परिभाषाओं की बुक बन जाती हैं और नीरज इससे परे कहाँ हैं. फ़िल्म के एक दृश्य में नीरज काबी का चरित्र कहता है – “याद है आपने एक बार पूछा था क्या कहेंगे लोगों से. हमारे पास कोई जवाब नहीं था. आज भी नहीं है. मुझे नहीं पता क्या नाम दूँ इस रिश्ते का? क्यों दूँ? हर रोज़ रात होने का इंतज़ार करता हूँ मैं हर सुबह इस उम्मीद से उठता हूँ कि आज रात दस बजे आपसे बात करने वाला हूँ. आपसे बातें करते करते यह अहसास हुआ है कि अब मैं छिपना नहीं चाहता हूँ. मैं आपके साथ चलना चाहता हूँ, आपके साथ जीना चाहता हूँ, आपकी फ़िक्र करना चाहता हूँ. आपसे प्यार करना चाहता हूँ.” यह फ़िल्म के दो मुख्य किरदारों के समाज में उनके रिश्ते को लेकर जेहनी दिक्कतों और किन्तु-परंतु का जवाब है क्योंकि नायक और नायिका के दोनों तमाम बातों और मन के साथ जाने के बावजूद इसी मनःस्थिति में हैं. फ़िल्म का किरदार अमर जो इस संवाद से पहले आये दृश्य में कहता भी है – “पता नहीं! मैं जहाँ जाना चाहता हूँ वहीं से भागता हूँ. शायद! रिश्तों से डर लगता है मुझे.”- उन तमाम अपने भीतर दबे भावों और एकाकी जीते हृदयों को कंवल सेठी एक आवाज़ देते हैं उनके पक्ष में खड़े होते हैं. इस पक्षपात में लेखक कंवल भाषणबाजी की कला नहीं, दिल के रिश्तों का सुमधुर संगीत और कोमलकान्त पदावली का सहारा लेते हैं. यही वजह है कि उनके नायक नायिका के मिलने के प्रथम अंकन में “किंवे मुखड़े तो नजरां हटावां/तेरे जिया होर कोई ना/तेरे नाल ज़िंदगी दी बसदी बहार…” हवाओं में तैरता है और मृगनयनी शेफाली के आँखों से तिरता हम तक पहुँच जाता है. कंवल सेठी ने फ़िल्म की कथा को जिस खूबसूरती से लिखा है उसी नफासत से गीत चुने हैं और वह अपने मुख्य किरदारों को मोतियों की तरह अपनी इस काव्यात्मक फ़िल्म में पिरो देते हैं. बहरहाल, शहर, रात, भीड़ ऊँची पथरीली इमारतों के बीच से बजते इस कोमल गांधार का एक जरूरी सहयोगी किरदार मुम्बई भी है. जब नायक नायिका को लेकर सड़कों पर पसरे जीवन को देखता है और उस दौरान दोनों में जो बातें होती हैं उस समय बरबस ही ‘महल’ की लता मंगेशकर की वह पंक्तियाँ याद आने लगती है -“ख़ामोश है ज़माना चुपचाप हैं सितारे/आराम से है दुनिया बेकल हैं दिल के मारे.” शहर मुम्बई इस फ़िल्म की एक अनिवार्य उपस्थिति है, जिसमें ऊँची इमारतें, बिजली के अनगिनत टिमटिमाते लट्टू, एक पुल जो बार-बार नायक-नायिका के मिलने के दरम्यान अपनी उपस्थिति बताते हैं और तभी हंसिका अय्यर की आवाज़ तवलीन सिंह के संगीत के साथ दर्शकों के ज़ेहन में धीमे से उतरता “तू ही तो है रहनुमा मेरा/तू ही तो है हमनवा …करवटों में ख्वाबों की इक हंसी मुस्कुराती है/पलकों के साये में रात ठहर जाती है/ बात बन जाती है”- शेफाली शाह और नीरज काबी के बीच के केमेस्ट्री को गहराई से स्थापित कर देती हैं.

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यह फ़िल्म दो अभिनय पाठशालाओं के संधिस्थल की तरह है. एक ओर शेफाली शाह है जिनकी अदाकारी और उनकी भावप्रवण पनियल बड़ी आँखों पर आप बरबस न्योछावर होते जाते हैं तो नीरज काबी का मैनरिज्म ओढ़कर निकलते हैं. दोनों कलाकारों ने संवादों से कम अपनी आँखों और देहभाषा से इस फ़िल्म का व्याकरण रच दिया है. वह दोनों उम्र के इस पड़ाव पर अपनी जिंदगी के खाली पन्नों, स्याह रातों, नीम खामोशी को एक-दूसरे की चंद यादों और साझे पलों को जीने एक नाव पर सवार होते हैं जहाँ न समुंदर के फैलाव से डर है न पहाड़ों की ऊंचाई का भय, हो भी क्यों?  ‘खुद को ढूंढ के किसी को पाया जा सकता है. शायद किसी और को पाकर खुद को ढूंढा जा सकता है.’ कम से कम जिंदगी यूँ ही गुजर गयी या जिंदगी तय करती तो पता नहीं क्या होता अथवा आदमी किसके लिए काम करता है, लोगों को क्या जवाब देंगे- जैसे सवालों में बीत जाने से बेहतर है फिर से शुरू करना. आख़िर ज़िंदगी वहीं से शुरू होती है जहाँ से हम खुद से शुरू करते हैं. वन्स अगेन जैसी फिल्मों के लिए यह सबसे मुफीद समय है.

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