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लक्ष्मण शाहाबादी: लोक परंपरा और गंवई मिट्टी की गंध से लबरेज गीतकार

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-पंकज भारद्वाज

सिनेमा और साहित्य का बड़ा गहरा संबंध रहा है. साहित्य ने सिनेमा को आधार दिया, संवारा, वहीं सिनेमा ने साहित्य को बड़ा आसमान दिया. उसे पसारा. जन-जन तक पहुंचाया. लोक साहित्य ने तो सिनेमा का संसार ही बदल दिया. कथानक से लेकर गीत तक, जो भी रचा गया, उसने अलग मुकाम बनाया. लोक साहित्य और धुनों पर बनी फिल्मों ने अपनी अलहदा छाप छोड़ी. हालांकि ऐसे कुछ ही लोग हुए, जो सिनेमा और साहित्य के बीच के इस संबंध सूत्र को कायदे से पकड़ पाए और कुछ ऐसा कर गए जो मील का पत्थर बन गया. सिनेमा में लोक रंग भरनेवाले ऐसे ही विलक्षण कलमचियों में शामिल है लक्ष्मण शाहाबादी का नाम. खांटी भोजपुरिया माटी में पैदा हुए लक्ष्मण शाहाबादी ने अपनी रचनाधर्मिता से भोजपुरी सिनेमा को नया आयाम दिया, ऐसा आयाम जिसे पाकर भोजपुरी सिने जगत आज भी खुद को गौरवान्वित महसूस करता है.

बिहार की राजधानी पटना से महज 60 किलोमीटर पश्चिम बसे आरा शहर के शिवगंज में 16 मई 1938 को एक कायस्थ परिवार में जन्मे लक्ष्मण शाहाबादी को संगीत और साहित्य विरासत में मिला था. उनके बचपन का नाम झुनन था. पिता रामलाला प्रसाद सितार वादक थे. शास्त्रीय संगीत के उस्ताद. घर में हर तरह के वाद्य यंत्र थे. जाहिर सी बात है बचपन में ही लक्ष्मण शाहाबादी का पाला इन वाद्य यंत्रों से पड़ा. ऐसे माहौल में पले-बढ़े शाहाबादी के भीतर भी गीत-संगीत के अंकुर फूट पड़े. बचपन में ही गाना-बजाना और गीत रचना शुरू कर दिया. संगीत की विधिवत शिक्षा उस्ताद जंगली मलिक से ली. बताया जाता है कि उनकी उम्र के बच्चे जब गलियों में, मैदानों में कबड्डी, फुटबाॅल, गिल्ली-डंडा खेला करते थे तब वे हारमोनियम, तबला, सितार जैसे वाद्य यंत्रों की संगत में मशगूल रहा करते थे. इसी का नतीजा रहा कि आगे चलकर उन्हें हर तरह के वाद्य यंत्र बजाने में महारत हासिल हो गई. कायस्थ परिवार से थे, सो कलम से रिश्ता पैदाइशी था. पढ़ाई-लिखाई कायदे से हुई. हिंदी साहित्य से डबल एम.ए. किया. हिंदी के अलावा उर्दू पर भी बेहतर पकड़ थी. भोजपुरी तो मातृभाषा ही थी, सो इससे उन्हें विशेष लगाव था. खासकर इसके लोक साहित्य और लोक धुनों से. इसमें दो राय नहीं कि लक्ष्मण शाहाबादी के पास कमाल का सौंदर्यबोध था, जो उनकी रचनाओं में खूब-खूब नजर आता है. अपने रचे गीत वे मंचों से खुद ही गाया भी करते थे. ‘दियरा के बाती अइसन जरे के परी/दुनिया में जिये खातिर मरे के परी‘ जैसे गीत बहुत पहले लोकप्रिय हो चले थे. समय के साथ उनके हिंदी-भोजपुरी गीतों की गूंज दिल्ली-मुंबई तक पहुंची. लोक परंपरा और गंवई मिट्टी की गंध से लबरेज इन गीतों के मुरीद लोग गीतकार को ढूंढने लगे. तब एचएमवी जैसी कंपनी ने शाहाबादी को बुलाया और उनका पहला हिंदी गीत रिकाॅर्ड हुआ-‘कह के भी न आये मुलाकात को/चांद-तारे हंस रहे थे कल रात को’. इस गीत को आवाज दी थी हिंदी सिनेमा के मशहूर गायक मो. रफी ने. इसके बाद उनका रिश्ता मायानगरी से जुड़-सा गया. बिहार से बनने वाली पहली हिंदी फिल्म ‘कल हमारा है‘ के सारे गीत लक्ष्मण शाहाबादी ने लिखे. इन गीतों को रचते हुए शाहाबादी ने हिंदी और भोजपुरी के बीच की खाई को पाट-सा दिया. गीतों में ऐसे भोजपुरी शब्द जोड़े, जिसे हिंदी भाषी भी आसानी से समझ सकें. इन गीतों को गाया मो रफी, उषा मंगेशकर, आशा भोंसले, मन्ना डे, दिलराज कौर, भूपिंदर सिंह जैसे दिग्गज गायक-गायिकाओं ने. इसके अलावा उन्होंने 1988 में बनी हिंदी फिल्म ‘घूंघट’ के लिये भी गीत लिखे. हालांकि उन्हें ख्याति मिली भोजपुरी फिल्मों से. 1981 में बनी भोजपुरी फिल्म ‘धरती मइया’ के गीत ही नहीं, संवाद भी लक्ष्मण शाहाबादी ने लिखे. इस फिल्म ने काफी शोहरत बटोरी. इस फिल्म में संगीत दिया था बाॅलीवुड के मशहूर संगीतकार चित्रगुप्त ने. फिल्म के सारे के सारे गीत हिट हुए. मो रफी का गाया ‘जल्दी-जल्दी चलू रे कहंरवा/सूरुज डूबे रे नदिया‘ किसे याद नहीं होगा. इसी फिल्म के एक अन्य गीत ‘केहू लुटेरा केहू चोर हो जाला/आवेले जवानी बड़ा शोर हो जाला’ ने भी भोजपुरांचल में कम शोर नहीं मचाया. यह शोर आज तक सुनाई देता है. 1983 में बनी फिल्म ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ के गीत लिखने का जिम्मा भी मिला लक्ष्मण शाहाबादी को. संगीतकार एक बार फिर चित्रगुप्त थे. इस फिल्म के गीतों ने भोजपुरी ही नहीं हिंदीपट्टी वालों को भी काफी प्रभावित किया. कोलकाता से लेकर दिल्ली-मुंबई और पंजाब-हरियाणा तक इन गीतों की पहुंच बनी. यह फिल्म ब्लाॅकबस्टर साबित हुई. कहें तो धूम मच गया धूम. लक्ष्मण शाहाबादी का नाम अब किसी परिचय का मोहताज नहीं रह गया था. ‘कहे के त सभ केहू आपन, आपन कहाए वाला के बा‘, ‘भींजे रे चुनरी, भींजे रे चोली, भींजे बदनवा ना‘, ‘मेला में सइयां भुलाइल हमार, अब हम का करीं‘, ‘गंगा किनारे मोरा गांव हो, घर पहुंचा द देवी मइया’ जैसे गीतों की गंध से कोई बच नहीं पाया. सबके सब गीत सुपर-डुपर हिट. उषा मंगेशकर का गाया इसी फिल्म का एक गीत ‘जइसे रोज आवेलू तू टेर सुन के/अइयो रे नींदिया निंदरबन से‘, तो इतना मशहूर हुआ था कि तब भोजपुरांचल के गांवों में माएं अपने बच्चों को सुलाने के लिए यही लोरी सुनाती थीं. खैर, अगले ही साल रिलीज हुई ‘भैया दूज’. इसके गीत भी लक्ष्मण शाहाबादी ने ही लिखे. इस फिल्म के गीत ‘कहंवा गइल लरिकइयां हो, तनी हमके बता द’ और ‘एही फागुन में कई द बियाह बुढ़ऊ’ काफी लोकप्रिय हुए. अभी लोग इन फिल्मों के गीतों को गुनगुना ही रहे थे कि 1986 में रिलीज हुई ‘दुलहा गंगा पार के’. इसमें गीत और संगीत दोनों लक्ष्मण शाहाबादी का था. इस फिल्म के टाइटल गीत ‘काहे जिया दुखवल, चल दिहल मोहे बिसार के/अतना बता द तू दुलहा गंगा पार के’ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि शाहाबादी का कोई जोड़ नहीं. यह भी तय हो चुका था कि भोजपुरी सिनेमा को एक ऐसा नायाब नगीना नसीब हो गया है जिसके भीतर हिंदी सिनेमा के शैलेंद्र (गीतकार) और नौशाद (संगीतकार), दोनों छिपे हैं.
            दरअसल, गीत गढ़ने में माहिर लक्ष्मण शाहाबादी मेलोडी के भी मास्टर थे. उन्होंने कई फिल्मों में संगीत भी दिया. बिहार के गोपालगंज निवासी मशहूर संगीतकार चित्रगुप्त के साथ उनकी खूब निभी. उनके साथ काफी काम किया और इस बीच उनसे सिनेमाई संगीत की बारीकियां भी सीखी. ‘छोटकी बहू’, ‘भैया दूज’, ‘राम जइसन भइया हमार’, गंगा आबाद रखिह सजनवा के’, ‘बेटी उधार के’, ‘गंगा ज्वाला’, ‘दगाबाज बालमा’, ‘हमार दुलहा’, ‘कसम गंगाजल के’ जैसी फिल्मों को लक्ष्मण शाहाबादी ने अपने गीत-संगीत से यादगार बना दिया. कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी. अस्सी-नब्बे के दशक में उनका नाम ही किसी भोजपुरी सिनेमा की कामयाबी की गारंटी होता था. भोजपुरी के ख्यातिलब्ध साहित्यकार डाॅ अरूण मोहन ‘भारवि’ के मुताबिक लक्ष्मण शाहाबादी ने सिनेमा को लोक से जोड़ा. वे लोक धुनों और लोक साहित्य के मर्मज्ञ थे. उन्होंने भोजपुरी सिनेमा को इससे बखूबी संस्कारित किया.

            कहें तो शाहाबादी ने अपने गीत-संगीत से भोजपुरी सिनेमा का स्वर्णिम दौर गढ़ा. तीस से भी ज्यादा सुपरहिट फिल्में दी. उनके मन में अभी बहुत कुछ करने की तमन्ना थी. भोजपुरी गीत-संगीत से ताल्लुक रखनेवालों को भी उनसे काफी उम्मीदें थीं. लेकिन, इन उम्मीदों को जबर्दस्त झटका लगा 19 दिसंबर 1991 को, जब महज 53 साल की उम्र में ही लोक साहित्य और लोक धुनों का यह यशस्वी चितेरा अंजाने सफर पर निकल गया. उनकी आखिरी फिल्म ‘गंगा झूठ न बोलावे’ अधूरी रह गई. शाहाबादी के जाने के बाद भोजपुरी फिल्म जगत में सन्नाटा-सा पसर गया. वैसी फिल्में, वैसे गाने, वैसा संगीत फिर कहां बन पाया भोजपुरी में. शाहाबादी खुद सिनेमा के स्कूल थे. गीतकार, संगीतकार, पटकथा लेखक, निर्माता, निर्देशक-सब कुछ. उनके जाने के तीस साल बाद भी भोजपुरी सिनेमा को दूसरा लक्ष्मण शाहाबादी कहां मिल पाया? वे इस दौर में कथित भोजपुरी गीतकारों के लिये आईना हैं, जिनकी कलम ने इस लोक भाषा का स्वरूप विद्रूप कर दिया है. उन लोगों को भी लक्ष्मण शाहाबादी के रचे गीतों को सुनना चाहिये, जिन्हें भोजपुरी गीत-संगीत में अश्लीलता नजर आती है.

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