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यूनुस परवेज (Yunus Parvez): सिनेमा के विस्मृत चेहरे (7)

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 आलेख: डॉ. एम. के. पाण्डेय
आलेख: डॉ. एम. के. पाण्डेय

सत्तर और अस्सी के दशक का हिंदी सिनेमा यूनुस परवेज (Yunus Parvez) की चर्चा के बिना अधूरा ही लगेगा. इस दौर में बतौर चरित्र अथवा सहायक अभिनेता यूनुस परवेज सिनेमा की अनिवार्य जरूरत जैसे हो गए थे. यश चोपड़ा निर्देशित, सलीम-जावेद लिखित और अमिताभ बच्चन शशि कपूर अभिनीत ‘दीवार’ फ़िल्म याद कीजिए. यूनुस परवेज वहाँ रहीम चाचा के रूप में मौजूद थे. यह वही किरदार है जो अमिताभ बच्चन के किरदार को बिल्ला नम्बर 786 के मायने बताता है.  रहीम चाचा का यह किरदार यूनुस के कैरियर की उड़ान लेकर आया. काम तो वह पहले से कर ही रहे थे पर ‘दीवार’ हिट क्या हुई, अमिताभ की तकरीबन हर फिल्म में वह दिखाई दिए. यानी अब उनका सिक्का मुम्बईया फ़िल्म जगत में चल निकला.

Yunus Parvez

हालांकि इसके पहले वह प्रकाश मेहरा की बतौर निर्देशक डेब्यू फ़िल्म ‘हसीना मान जाएगी’ में एक पंजाबी चौकीदार की भूमिका निभा चुके थे. यह साल 1968 का था और इसमें उनके अधिकतर दृश्य तब के एक और लीजेंड जॉनी वाकर के साथ थे. उनके सामने यूनुस परवेज ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया. इस फ़िल्म में शशि कपूर की दोहरी भूमिकाएं थीं और नायिका बबिता थीं. हसीना मान जाएगी से पहले वह 1963 में आई फ़िल्म ‘कण कण में भगवान’, ‘सहेली’, ‘भरत मिलाप’ और ‘पिंजरे का पंछी’ जैसी फिल्मों में काम कर चुके थे परन्तु उनको पहली बार गम्भीरता से ‘हसीना मान जाएगी’ में निभाए किरदार से ही नोटिस किया गया. उन्होंने राजश्री प्रोडक्शंस की फ़िल्म ‘उपहार’ भी की थी. उपहार में वह बनवारी की भूमिका में थे और उन पर एक मशहूर गीत ‘मांझी ढूंढे नईया किनारा’ भी फिल्माया गया था. लेकिन उनके करियर की सही उड़ान को ‘दीवार’ के उस छोटे रोल से ही माना जाता है.

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यूनुस परवेज का जन्म 03 सितंबर 1934 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में हुआ था. उनके पिता जनाब महमूद खान पुलिस महकमे के आला अफसर थे और उनकी पोस्टिंग मिर्जापुर में थी. बाद में, उनके पिता मुरादाबाद में पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के प्राचार्य भी रहे. सो यूनुस की शुरुआती पढ़ाई लिखाई मिर्जापुर, जौनपुर जैसी जगहों पर हुई और उच्च शिक्षा के लिए वह पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आ गए. यहाँ उनके शिक्षक हरिवंशराय बच्चन और फिराक गोरखपुरी जैसी शख़्सियतें थीं. युवक यूनुस में अभिनय के बीज इलहाबाद यूनिवर्सिटी से ही पड़े. यूनुस परवेज ने यहाँ यूनिवर्सिटी का थियेटर ग्रुप ज्वाइन कर लिया और इंटर यूनिवर्सिटी नाटक प्रतियोगिताओं में लगातार बेस्ट एक्टर का खिताब जीतते रहे. एक रिपोर्ट की माने तो यूनुस ने इंटरसिटी यूथ फेस्टिवल में लगातार तीन साल तक बेस्ट एक्टर का अवार्ड जीता था. इन दिनों में वह खासा चर्चित भी हो गये थे. स्थानीय अखबारों में उनके बारे में छपने भी लगा था और यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में भी वह बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे थे.

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आगे की पढ़ाई यानी पीएचडी करने के लिए वह दिल्ली आ गए. दिल्ली उनके नाट्य और अभिनय जीवन का सबसे स्वर्णिम पन्ना है. जिन दिनों वह पीएचडी की तैयारियों में लगे थे, उन्हीं दिनों उनकी मुलाकात लेखक दीवान वीरेंद्रनाथ से हुई. वीरेंद्रनाथ अभिनेता कबीर बेदी के चाचा थे. वीरेंद्रनाथ को पता था कि इस युवक को नाटक और ड्रामे की अच्छी समझ है तो वह एक दिन यूनुस परवेज को रूसी दूतावास में लेकर गये. वहाँ उस रोज इंडियन थियेटर पर परिचर्चा हो रही थी. यहीं पर यूनुस परवेज की मुलाकात भारतीय रंगमंच के सबसे शानदार किरदारों में से एक हबीब तनवीर, बेगम कुदसिया जैदी, माइम कलाकार इरशाद एवं कवि नियाज़ हैदर से हुई. इस मीटिंग ने दिल्ली में यूनुस के रंग संस्कारों को और समृद्ध क़िया. इसी समय उन्हें उत्तर प्रदेश का बेस्ट एक्टर अवार्ड भी मिला था. 1956 के आसपास उन्होंने बेगम कुदसिया जैदी के रंगमंडल ‘हिंदुस्तानी थियेटर’ को ज्वाइन कर लिया. इन्हीं दिनों में उनका परिचय थियेटर की कुछ और नामचीन हस्तियों से हुआ. बेगम कुदसिया जैदी दिल्ली के मशहूर संस्कृतिकर्मी थीं. उनके नाटकों को देखने देश के बड़े नेता मसलन पंडित जवाहरलाल नेहरू, कृष्ण मेनन, जाकिर हुसैन तक आते थे. इन्हीं दिनों मिस्र के राष्ट्रपति के आगमन पर राष्ट्रपति भवन में ‘शकुंतला’ नाटक का मंचन हुआ, जिसमें यूनुस परवेज की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी. किंतु बेगम कुदसिया जैदी के असमय देहांत के बाद हिंदुस्तानी थियेटर बंद हो गया. हबीब तनवीर पहले ही इसे छोड़कर पहले राडा और बाद में अपने नया थियेटर की नींव डाल चुके थे. इसके बाद यूनुस 1964 में मुंबई (तब बम्बई) चले गए. वहाँ जाकर उन्होंने इप्टा ज्वाइन कर लिया. यहाँ उनकी मुलाकात बलराज साहनी, रमेश तलवार, नरेंद्र शर्मा, सागर सरहदी, ख्वाजा अहमद अब्बास, एम. एस. सथ्यू से हुई, जो पहले से ही थियेटर और सिनेमा के सम्मानित नाम थे. इप्टा के साथ-साथ यूनुस हिंदी फिल्मों में भी छोटे-मोटे रोल करने लगे.

Yunus Parvez

उनकी फिल्मी यात्रा का दायरा साठ के दशक से लेकर नब्बे के दशक तक पसरी हुई है. उनकी कुछ प्रमुख फिल्मों में हसीना मान जाएगी, गरम हवा, शान, मिस्टर नटवरलाल, निकाह, दहलीज, लैला, इंसाफ का तराजू, बाज़ार, अवाम, अंगूर, उमराव जान, द बर्निंग ट्रैन, मिस्टर इंडिया, शहंशाह, गोलमाल, कयामत से कयामत तक, फरिश्ते, अजूबा आदि हैं. यूनुस परवेज ने लगभग 400 फ़िल्मों में काम किया. सथ्यू की ‘गरम हवा’ में उन्होंने एक अवसरवादी, काइयाँ नेता की भूमिका निभाई थी, जिसके लिए उत्तरप्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने उनको सम्मानित भी किया था. उनकी मातृभाषा भोजपुरी थी और उनके करियर के साथ ही भोजपुरी सिनेमा का उभार भी हो चला था तो उन्होंने अपनी जबान के सिनेमा में भी काम किया. बांकेबिहारी एमएलए उनकी एक ऐसी ही फिल्म रही. ‘गोलमाल’ में उत्पल दत्त के दफ्तर के बड़े बाबू की भूमिका और ‘अंगूर’ में संजीव कुमार के साथ उनकी निभाई भूमिका आज भी सिने-दर्शकों की जेहन में ताजा हैं. जहाँ तक पारिवारिक जिंदगी का सवाल है तो उनकी शादी मदीना बेगम से हुई थी जिनसे उनको पांच बेटियां हुई और दो बेटे भी. उनके बेटे अरशद खान की फ़िल्म ‘पहली नजर का प्यार’ में भी उन्होंने अभिनय किया. हालांकि इस समय तक उनकी डायबिटीज काफी बढ़ चुकी थी लेकिन वह इस बात से काफी खुश थे कि उनके बेटे ने सिनेमा में काम करना शुरू कर दिया है. बाद में फिल्मों में बतौर निर्देशक उनके बेटे का कैरियर कुछ खास नहीं रहा. खराब सेहत के बावजूद यूनुस परवेज ने बंटी और बबली तक फिल्मों में काम किया. एक समय सुनील दत्त से दोस्ती की वजह से यूनुस परवेज ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की और सुनील दत्त के चुनाव प्रचार में पूरे जोर-शोर से लगे. यह दीगर बात है कि बाद में वह कांग्रेस पार्टी से निकल समाजवादी पार्टी में भी गए और फिर वहां से भी निकल कर वापस कांग्रेस में शामिल हो गए पर दूसरे अधिकांश हिंदी अभिनेताओं की तरह उनका राजनीतिक जीवन बहुत उल्लेखनीय नहीं रहा.

हिंदी सिनेमा का विस्मृत चेहरा

पर एक बात में वह पूरे हिंदी सिनेमाई जगत में विशिष्ट थे, वह बात थी उनकी तालीम. हिंदी सिनेमा के इतिहास में अगर हम अभिनेताओं पर नजर डालें तो पाएंगे कि युनुस परवेज़ बेहद आला दर्जे के अभिनेता ही नहीं थे बल्कि उच्च शिक्षा प्राप्त भी थे और उर्दू और हिंदुस्तानी ज़बान में उनका तलफ्फुज इतना साफ था कि लोगों को आश्चर्य होता था. रंगमंच के उस्तादों की देखरेख में की ट्रेनिंग और अनुभव ने सिनेमा के हर किरदार में यूनुस परवेज को विशेष पहचान दी. इसकी बानगी आप उनके निभाए किरदारों में देख सकते हैं. युनुस परवेज़ हिंदी सिनेमा के निर्माणक तत्वों में से एक जरूरी शख्सियत के तौर पर हमेशा याद किए जाएंगे. उम्र के आखिरी छोर पर अपने डायबिटीज की अधिकता से जूझते 11 फरवरी 2007 को इस बाकमाल अभिनेता ने जिंदगी के परदे से विदा ले ली और वह अपने पीछे अपने निभाए किरदारों की एक लंबी सूची हमारे मनोरंजन के लिए छोड़ गए.

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