Mon. Nov 23rd, 2020

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‘मन अमृता होने को आतुर है’: थप्पड़

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THAPPAD


दिल की बात: गौरव

अमूमन मैं किसी भी अच्छी फिल्म को थिएटर में देखना ही पसंद करता हूं और देखता भी हूं. और बाकी चलताऊ फिल्मों को ओटीटी प्लेटफॉर्म या फिर किसी और माध्यम से देखने का इंतजार करता हूं. पर इतने सालों में पहली बार किसी फिल्म ने मुझे यह एहसास दिलाया कि बिना फिल्म देखें केवल सब्जेक्ट और अपने पूर्वाग्रह के बेसिस पर किसी फिल्म को अच्छी या बुरी मानकर देखना या ना देखना मेरी सबसे बड़ी गलती थी. मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि इस फिल्म को ना देखने के पीछे भी मेरा पूर्वाग्रह ही था. मैं मान बैठा था कि क्यों एक वैसी कहानी के पीछे थिएटर में जाऊं जिसमें कोई लड़की या यूं कहूं पत्नी सिर्फ एक थप्पड़ की वजह से अपने बने बनाए फैमिली को धत्ता बताकर अपनी अलग राह चुन लेती है. जी मैं बात कर रहा हूं “थप्पड़” की. आज जब अमेजॉन पर “थप्पड़” देखा तो पहली बार एहसास हुआ बिना देखे किसी फिल्म को पूर्वाग्रह की वजह से नकार देना कितना गलत फैसला हो सकता है. और यकीन मानिए थप्पड़ से पहले किसी फिल्म ने मुझे इस बात का एहसास नहीं दिलाया था. फिल्म खत्म होने के कुछ घंटों बाद तक मैं इसी ऊहापोह में रहा कि आखिर क्यों मैंने इस फिल्म को थिएटर में नहीं देखा. खैर…
वैसे अगर मैंने इस फिल्म को पहले थिएटर में देखा भी होता तो उसकी एक वजह तापसी होती, पर वहां भी मैं चूक गया.
अभी आधी रात को मैंने फिल्म खत्म की है. और सच कहूं इस एक कहानी ने मुझे इस कदर विचलित कर दिया है कि मैं अपने आसपास की दुनिया की हर दूसरी-तीसरी औरत में एक अमृता को देख रहा हूं. चंद पलों में ही बचपन से अब तक की कई ऐसी अमृता आंखों के आगे से गुजर चुकी है, जो अपने विक्रम की जिंदगी संवारते – संवारते कब हरी-भरी से ठूंठ बन गई उन्हें खुद पता नहीं लगा.

अब सोच रहा हूं तो लग रहा है कि क्या वाकई अमृताओं की जिंदगी विक्रम के अनंत इच्छाओं की बलि चढ़ने के लिए ही बनी है. क्यों नहीं असल जिंदगी में हर अमृता तापसी का प्रतिरूप बन कर सामने आती है, और खामोशी के साथ हर विक्रम को उसकी असली जगह बता जाती है.


शुक्रिया कहना चाहूंगा अनुभव सिन्हा और मृणमयी लागू का, जिन्होंने पुरुषवादी मानसिकता का नकाब ओढ़कर समाज में प्रतिष्ठित जीवन जीने वाले हर स्टेटस पसंद पुरुष को इस साधारण सी दिखने वाली असाधारण कहानी के जरिए आइना दिखा दिया.
अमृता के शुरुआती निर्णय से मन खिन्न भी हुआ था. सच में लगा, क्यों !! विक्रम के भावावेश में किए गए हरकत के प्रति इतनी कठोरता क्यों? पर विक्रम के इसी सवाल के प्रत्युत्तर में अमृता का यह जवाब दिल निकाल ले गया जब उसने यह कहा “मैं तुम्हारे पास आऊंगी विक्रम, पर उस वक्त, जब मेरे दिल में तुम्हारे लिए फिर से प्यार होगा, अभी नहीं है तो साथ रहना भी मुमकिन नहीं, मुझे थोड़ा वक्त चाहिए, कितना मुझे खुद नहीं पता”. इस एक जवाब ने इस फिल्म के प्रति मेरे बने बनाए सारे पूर्वाग्रहों को क्षण में ध्वस्त कर दिया. उस क्षण लगा हमारे आसपास आधे से अधिक पुरुषों की शक्ल विक्रम से ही तो मिलती है. और हर विक्रम की जिंदगी में एक पल ऐसा आता है जब उसकी अमृता उससे अपने दिल में खुद के लिए प्यार पनपने देने का इंतजार करने को कहती है. पर हर विक्रम अपने अहम, अपनी महत्वाकांक्षा और अपनी पुरुषवादी सोच के वशीभूत होकर प्यार के बदले हावी होने के प्रयासों में लग जाता है. दोष अकेले विक्रम का नहीं है, दोष सदियों से चली आ रही उस सोच का है जो पीढ़ी दर पीढ़ी विक्रम जैसों के दिमाग को दीमक की तरह खोखला कर चुका है.
अमृता का सवाल विक्रम की हर हरकत के साथ वाजिब होता चला जाता है कि सवाल बस एक थप्पड़ का नहीं है, सवाल उस सोच का है, जिसे उस घटना के बाद भी उस थप्पड़ की गलती का अहसास नहीं है. उस सोच का है जिसके लिए अपनी महत्वाकांक्षाओं से लगाव तो इमोशनल है, पर अपनी पत्नी के इमोशन से लगाव की रत्ती भर परवाह नहीं है. और उस सोच का भी है जो अपनी इन महत्वाकांक्षाओं के पीछे तर्क तो अपने परिवार की खुशियों की देते हैं, पर उसी परिवार की खुशी और प्यार को अपनी महत्वाकांक्षाओं की वेदी पर बलि चढ़ा देते हैं.


विचारों का भंवर उमड़ रहा है मन में. एक अजीब से अंतर्द्वंद से जूझ रहा हूं. मन अमृता होने को आतुर है, पर दिमाग में विक्रम वाले सोच की जंग लग चुकी है. जानता हूं जंग की खुरचन इतनी आसान नहीं, पर शायद नामुमकिन भी नहीं.


और आखिर में, क्या कहूं तापसी. अपनी हर अगली फिल्म के साथ पिछली फिल्म के लिए मेरे मन में बने अपने छवि का आकार बड़ा करती जा रही हो. बेबी से शुरू हुआ यह सफर पिंक, मनमर्जियां, मुल्क होता हुआ थप्पड़ तक आ पहुंचा है. आप असल जिंदगी में भी वाकई अमृता हो जिसे अपने कद की ऊंचाई नापने के लिए किसी विक्रम की दरकार नहीं.

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