Mon. Nov 23rd, 2020

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LUDO Review – बेहतरीन खिलाड़ियों का मजेदार गेम है अनुराग बासु की ‘लूडो’

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लूडो गेम से तो लगभग हर कोई वाकिफ होगा. बच्चा हो या जवान या हो घर के दद्दा ये खेल ऐसा है कि इस खेल में हर किसी की दिलचस्पी रही ही होती है. चार कलर की गोटियों (लाल, हरा, पीला, नीला) का अपने घर से निकलकर एक दूसरे से लड़ते-भिंडते मंजिल तक पहुंचने का खेल है लूडो. ये जो खेल है ना हमारे ही दिमाग की उपज है, कहीं न कहीं असल जिंदगी भी इसी खेल की तरह चलती है. फर्क नहीं पड़ता तुम कैसे खेल रहे हो और कब से खेल रहे हो, आखिर में जाना सबको एक ही जगह होता है. इसी ludo के खेल से असलियत को जोड़ कर निर्देशक अनुराग बासु ने एक कहानी रची है, जिसमें चार कलरफुल ज़िंदगियाँ, उन ज़िंदगियों की दिलचस्प कहानियां और इनसब के बीच की मुख्य कड़ी डाइस (Dice) है. डाइस का तो पता ही होगा जिससे पूरा लूडो खेल चलता है.

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जैसे लूडो में पहला स्टेप डाइस (Dice) का ही होता है ठीक उसी प्रकार इस फिल्म की शुरुआत सत्तू भैया (पंकज त्रिपाठी) के द्वारा 1951 में आई ‘अलबेला’ फिल्म के गाने “ओ बेटा जी, ओ बाबू जी…” को गुनगुनाते होती है. सत्तू एक बड़े बिल्डर ‘भिंडर’ का मर्डर करके एक छोटी वैन में कुछ आदमियों के साथ निकला होता है. कहानी यहीं से पहले 25 मिनट में सारे किरदारों के साथ आगे बढ़ती है और एक वक्त आता है जब सब सत्तू भैया को वजह से एक जगह इकट्ठा होते हैं फिर होता है ‘बूम’. इसके बाद सारे किरदार अलग-अलग होकर अपना गेम खेलने लगते हैं. लेकिन जैसा कि ‘लूडो’ में होता है सब अपना गेम तो खेलते हैं लेकिन सब एक दूसरे इर्दगिर्द ही होते हैं और वक़्त-वक़्त पर एक-दूसरे से टकराते रहते हैं. इन सभी गोटियों का अपना सफर होता है.

‘लाल गोटी’ मतलब बिट्टू (अभिषेक बच्चन) जो कभी सत्तू भैया का राइट हैंड हुआ करता था लेकिन प्यार की वजह से क्राइम की दुनिया छोड़ चुका होता है. इसके बावजूद भी उसे किसी वजह से 6 साल जेल की सजा हुई होती है. जब वो सजा काट कर वापस लौटता है तो आकर देखता है कि जिसके लिए सबकुछ छोड़ा था उसने उसे ही छोड़ दिया. उसकी एक 6 साल की बेटी होती है जिसे पाने की हर कोशिश करता रहता है. इसी बीच उसकी लाइफ में एक दूसरी छोटी लड़की आती है जो उसके ज़िंदगी के खेल को दिलचस्प बनाती है. अभिषेक बच्चन इस बार बहुत गंभीर किरदार में हैं और ज्यादातर इमोशनल दृश्य उनके हिस्से ही आये हैं. जब-जब अभिषेक बच्चन ऐसे किरदारों में दिखे हैं वो बिल्कुल अलग ही नजर आए हैं. चाहे फिल्म ‘युवा’ में हों या ‘गुरू’ में. उनके साथ दिखी बच्ची और उनके बीच के सीन रुलायेंगे भी, हसाएंगे भी. मुझे फिल्म की सबसे खूबसूरत जोड़ी लगी है ये.

‘हरी गोटी’ मतलब आलू (राजकुमार राव) जो पिंकी (फातिमा सना शेख) के प्यार में डूबा हुआ है लेकिन पिंकी किसी और से शादी रचा चुकी है. वो इन्हें फ्रेंड मानती है और ये उसे ज़िंदगी. आलू की लाइफ के लूडो तब लगते हैं जब पिंकी का पति जेल चला जाता है और उसे निकलवाने के लिए वो आलू के पास मदद मांगने आती है. आलू, पिंकी की किसी बात को टाल नहीं पाता, वो बर्बादी की आखिरी हद तक बर्बाद होना चाहता है. राजकुमार राव ने इस रोल में सबको अपने अटपटे अंदाज से बहुत हंसाया है. चाहे उदास होने पर नाचना हो या पिंकी की हर बात पर हाँ कर देना हो. उनके साथ फातिमा सना शेख धाकड़ लगी हैं, बिल्कुल देसी गर्ल.

‘पीली गोटी’ मतलब आकाश (आदित्य रॉय कपूर) जो कि स्ट्रगलर आर्टिस्ट है. अपनी एक्स गर्लफ्रैंड श्रुति (सान्या मल्होत्रा) के साथ उसकी एक सेक्स वीडियो ऑनलाइन लीक हो जाती है. जब ये कांड होता है उसके 6 दिन बाद श्रुति की शादी होने वाली होती है. वीडियो को ऑनलाइन साइट से हटवाने और श्रुति की शादी बचाने की जुगत में दोनों लग जाते हैं और इस चक्कर मे इन दोनों की लाइफ के भी लूडो लग जाते हैं. आदित्य और सनाया ने रोमांस का एंगल संभाला है और दोनों प्यारे भी लगे हैं. यहां सान्या अभिनय के मामले में आदित्य पर भारी पड़ी हैं.

‘नीली गोटी’ मतलब राहुल (रोहित सराफ) जो बेरोजगार है, दर-दर की ठोकरे खाता है. सत्तू ने जिस बिल्डर को मारा होता है गलती से राहुल उसका अकेला चश्मदीद गवाह बन जाता है और सत्तू भैया की चंगुल में आ जाता है. उसके साथ एक साउथ इंडियन लड़की श्रीजा (पार्ले मानी) जुड़ती है. जो पेशे से नर्स रहती है. दोनों एक घटना के बाद सत्तू भैया का पैसे से भरा बैग लेकर फरार हो जाते हैं. रोहित और पार्ले बहुत मासूम लगे हैं उनकी मासूमियत ने फिल्म को फ्रेश बनाये रखा है. बड़े और चर्चित कलाकारों के बीच इन दोनों ने बड़ी मजबूत तरीके से कंधे से कंधा मिला कर अभिनय किया है.

बातें सबकी हो गयी तो अब इन सबके उस्ताद की भी हो जाये. जी हाँ! पंकज त्रिपाठी जो गैंगस्टर के किरदार में हैं जिसे देखकर आप डरेंगे तो नहीं लेकिन मुस्कुरायेंगे जरूर. ये किरदार इंटेस तो है ही साथ ही साथ कॉमिकल भी है. कह सकते हैं डार्क और ह्यूमरस. पंकज त्रिपाठी जब-जब आपको स्क्रीन दिखेंगे आप कुछ नया पाएंगे. एंटरटेनमेंट की कोई कमी नहीं दिखेगी इस किरदार में.

इन सभी किरदारों का एक दूसरे से पूरी फिल्म में वजह-बेवजह टकराना चलता रहता है. अंत में लूडो के खेल के जैसे ही सभी एक जगह फिर से इकट्ठा होते हैं और सब अपने-अपने खेल खेलने के तरीकों से हारते-जीतते हैं. इस फिल्म की अपनी एक फिलॉसफी है जिसे अनुराग बासु ने खुद इस फिल्म में उपस्थित रहकर नैरेट किया है. वो भी इस फिल्म में दिखे हैं. फिल्म के शुरुआती आधे घंटे का स्क्रीनप्ले जिस हिसाब से लिखा गया है वो इसे असाधारण फिल्म बनाने की शुरूआत करता है. हर सीन में हर किरदार को एक दूसरे के साथ जुड़ा दिखाना. जैसे राह चलते इंसान को आप एक सीन में इग्नोर कर देंगे फिर अगले सीन में पता चलेगा कि अरे ये तो मुख्य किरदारों में से एक था.. ऐसे कई मोमेंट शुरू के आधे घंटे तक में दिखते हैं. कहानी उसके बाद भी अपनी रफ्तार बनाये रखती है लेकिन थोड़े अलग तरह से. क्लाइमेक्स मनोरंजक तो है लेकिन साधारण है, देखते हुए लगेगा कि इस तरह के क्लाइमेक्स आप पहले भी देख चुके हैं.

अगर आपने अनुराग बासु की बर्फी देखी होगी तो उनके कहानी कहने के स्टाइल से आप वाकिफ होंगे. उनकी फिल्मों में संगीत कहानी के साथ चलते हैं वो आपको भटकने का मौका नहीं देते. इस फिल्म में भी वैसे ही गाने के साथ कई दृश्य चलते हैं. एक तरह से कई जगह म्यूजिकल जर्नी वाली फीलिंग आती है. सीन के मूड के हिसाब से गाने और उन गानों में दिखते सारे किरदारों की कहानी, इस कॉम्बिनेशन को अनुराग जैसे निर्देशक ही संभाल सकते हैं.

फिल्म में ऐसे-ऐसे डायलॉग्स हैं जिनपर भी चर्चा जरूर होगी, जैसे- “हम तुम्हें मार नहीं रहे मुक्त कर रहे हैं”
“सोच सही है ज़माना गलत है”, कुछ लोगों को प्यार में बर्बाद “होने की चुल्ल मची होती है”. फिल्म के लोकेशन खूबसूरत हैं और सिनेमेटोग्राफी भी बेहतरीन हैं. एक्शन सीन को भी बिना ज्यादा वॉइलेन्स के बड़े प्यार से, बड़े आराम से दिखाया गया है. फिल्म लगभग ढ़ाई घंटे की है, हो सकता है आप लेंथ देखकर एक बार सोचे लेकिन जब आप फिल्म देखना शुरू कर देंगे तो आप सोचेंगे काश ये और लंबी होती है. सिर्फ इस इसलिए नहीं कि अच्छा निर्देशक, अच्छे अभिनेता और अच्छी कहानी है बल्कि इसलिए भी खास क्योंकि आपको इसमें कई सिनेमाई एक्सपेरिमेंट भी दिखेंगे जो आपको रेगुलर फिल्मों से अलग वाली फीलिंग देंगे.

अगर आप पिछले हफ्ते आई ‘लक्ष्मी’ फिल्म देख कर सदमें में हैं तो ये फिल्म आपका पूरा मनोरंजन करेगी लेकिन हाँ शुरू में जिस तेजी से भागती हुई स्क्रीनप्ले है वो बाद में थोड़ी धीमी लग सकती है लेकिन वो इसलिए क्योंकि आप शुरू के आधे घंटे में कुछ ज्यादा ही तेज रफ्तार पकड़ चुके होते हैं. अगर ज्यादा लॉजिकल न होकर फिल्म के मुख्य संदेश को समझ कर उसके फ्लो के साथ बढ़ते चले जायेंगे तो इस फिल्म को बहुत एन्जॉय करेंगे.

दिव्यमान यती


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