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कोरोना काल के बाद बदलेंगे Theatre हालात या ओटीटी का कायम रहेगा वर्चस्व

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साल 2020 के शुरुआत में शुरू हुआ कोरोना वायरस का प्रकोप साल का अंत आते-आते धीमा पड़ने लगा था, देश के वो सभी वर्ग, जिनकी कोरोना काल में आर्थिक रूप से कमर टूट चुकी थी, उम्मीद लगाए हुए थे कि हालात में धीरे-धीरे सुधार आने लगेगा। इसमें से एक तबका फिल्म थिएटर्स ग्रुप का था। लॉकडाउन में फिल्म इंडस्ट्री के निर्माताओं ने नुकसान से बचने के लिए थिएटर की जगह ओटीटी (ओवर द टॉप) का सहारा लेने लगे थे। छोटे बजट की फिल्में ओटीटी पर धड़ाधड़ रिलीज हो रहीं थीं लेकिन बड़े बजट की फिल्में अभी भी थिएटर (Theatre) के खुलने के इंतज़ार में थीं।

पहली लहर के बाद हालात में थोड़े सुधार आये थिएटर कोरोना गाइडलाइंस के अंतर्गत खोल दिये गए। सिनेमाघर खुलने के बाद भी बॉलीवुड के निर्माता अपनी फिल्में रिलीज कराने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। उनके लिए रास्ता बनाया हॉलीवुड और साउथ इंडस्ट्री की फिल्मों ने, उनके रिलीज और औसत सफलता को देखते हुए बॉलीवुड की फिल्मों के रिलीज का सिलसिला शुरू हो गया। जिसमें दो बड़ी फिल्में पहली राजकुमार राव और जान्हवी कपूर की ‘रूही’ और दूसरी जॉन अब्राहम की ‘मुंबई सागा’ सिनेमाघरों में आईं। उनके आने के बाद दर्शक सिनेमाघरों की तरफ रुख करने लगे। हालांकि उनके फिल्मों का कलेक्शन औसत ही रहा लेकिन उम्मीद जगी कि धीरे-धीरे पुराना दौर वापस आ जायेगा लेकिन किसे पता था असली तबाही भविष्य के गर्भ में छिपी हुई है।

कोरोना के दूसरे लहर ने तोड़ी उम्मीदें

कोरोना के दूसरे लहर ने फिर से देश को चपेट में ले लिया, ये लहर पहले से ज़्यादा भयावह थी। फिर से एक बार सिनेमाघर बंद हो गए, जगी हुई उम्मीद पूरी तरह से टूट चुकी थी। एक बार फिर फिल्म निर्माताओं ने अपनी फिल्में दर्शकों तक पहुंचाने के लिए ओटीटी का सहारा लिया। इस बार बड़े स्टार्स को भी मजबूरी में भी ओटीटी पर अपनी फिल्मों को लेकर आना पड़ा। चाहे वो सलमान की फिल्म ‘राधे-द मोस्ट वांटेड भाई’ हो या अजय देवगन की ‘भुज-द प्राइड ऑफ इंडिया’ हो। सिद्धार्थ मल्होत्रा की महंगे बजट की ‘शेरशाह’ भी ओटीटी पर ही रिलीज हुई। ये सिलसिला अभी चल ही रहा है सैफ अली खान-अर्जुन कपूर की फिल्म ‘भूत पुलिस’ और कार्तिक आर्यन की फिल्म ‘धमाका’ के ओटीटी पर आने का ऐलान हो चुका है। सिनेमाई माहौल फिर से ओटीटीमय हो गया, थिएटर (Theatre) से जुड़े लोगों को तकलीफें बढ़ने लगीं।

बेल बॉटम ने जगाई उम्मीद

कोरोना की दूसरी लहर ठंडी पड़ने लगी है और बाज़ार खुलने लगे हैं। कुछ राज्यों को छोड़कर अधिकतर राज्यों में 50% दर्शक क्षमता के साथ सिनेमाघरों के खुलते ही बॉलीवुड के सुपरस्टार अक्षय कुमार ने अपनी फिल्म ‘बेल बॉटम’ को सिनेमाघरों में रिलीज कर के एक बड़ा और रिस्की कदम उठाया। रिस्की इसलिए क्योंकि मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में सिनेमाघर पूरी तरह से बंद हैं और बॉलीवुड को सबसे ज़्यादा फायदा यहीं से होता है। अक्षय कुमार के इस फैसले पर थिएटर (Theatre) मालिकों ने उन्हें दिलेर बताते हुए उनका धन्यवाद किया। सभी फिल्म एनालिस्ट्स की नज़र थी अक्षय की ‘बेल बॉटम’ के व्यवसाय पर, उम्मीद थी कि माहौल भले ही खिलाफ है लेकिन ये फिल्म पहले दिन 5 करोड़ और वीकेंड तक लगभग 20 करोड़ के आंकड़े के आस-पास तो पहुंच ही जाएगी। पर ऐसा हुआ नहीं ये फिल्म पहले दिन 2.75 करोड़ के साथ एक हफ्ते के बाद भी 20 करोड़ का आंकड़ा पार नहीं कर पाई। एक हफ्ते का इसका टोटल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 19.4 करोड़ रहा। इसके रिलीज के अगले हफ्ते ही अमिताभ बच्चन और इमरान हाशमी भी अपनी फिल्म ‘चेहरे’ लेकर आ गए। इनकी फिल्म का हाल तो और बुरा हुआ कई जगह थिएटर खाली होने की वजह से शो तक रद्द करने पड़ गए।
थिएटर (Theatre) खुलने के बाद भी दर्शकों के इस तरह के रुझान ने वाकई में फिल्म निर्माताओं को सोचने पर मजबूर किया है। अभी लाइन में 83, सुर्यवंशी, ब्रह्मास्त्र, पृथ्वीराज, जर्सी, लाल सिंह चड्ढा, मैदान, रक्षाबंधन, गंगूबाई काठियावाड़ा, शमशेरा, सत्यमेव जयते-2 जैसी बड़े बजट की बहुत सारी फिल्में हैं जो बनकर तैयार हैं।

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फिल्म रिव्यू : सिस्टम का काला सच दिखाती हलाहल

ये दौर फिल्म इंडस्ट्री के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है, भले ही ओटीटी पर फिल्में रिलीज करा कर वो अपनी लागत पर थोड़ा बहुत मुनाफ़ा कमा ले रहे हैं लेकिन थिएटर (Theatre) से होने वाली भारी-भरकम कमाई से वो पिछले दो सालों से मरहूम हैं। सबसे ज़्यादा नुकसान थिएटर से जुड़े लोग झेल रहे हैं उनके पास सिवाय उम्मीद के कुछ भी नहीं। आने वाले वक्त में कोरोना का प्रकोप खत्म हो जाने के बाद असल चुनौती दर्शकों को ओटीटी के मोह से बाहर निकाल कर सिनेमाघरों तक लाना है। उन्हें जब सारे कंटेंट अपने घर बैठे स्मार्ट फोन और कंप्यूटर में ही मिल जा रहे हैं तो वो सिनेमाघर क्यों जाएंगे? फर्स्ट डे फर्स्ट शो के प्रचलन को अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स भुना रहे हैं। ओटीटी भविष्य है पर ये बात भी सच है कि सिनेमा देखने का असली मजा थिएटर (Theatre) में ही है, एक साथ सैकड़ों लोगों के साथ बैठकर फिल्म को एन्जॉय करने का अनुभव ओटीटी नहीं दे सकता है। इस चुनौती को स्वीकार करके सिनेमा की दुनिया से जुड़े हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वो सिनेमा के सबसे प्रचलित माध्यम थिएटर को फिर से बहाल करने में अपना योगदान दे। हम उम्मीद करते हैं कि फिर से ऐसा माहौल तैयार हो कि दर्शक सिनेमाघरों तक खिंचा चला आये। फिर से टिकट खिड़की बहाल हो, सिनेमाघरों के बाहर हॉउसफुल के बोर्ड लगें। ऐसा माहौल ही सिनेमा बाजार के स्वास्थ्य में सुधार ला सकता है।

-दिव्यमान यती (फिल्म समीक्षक)